tag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1152418961395062322006-07-09T00:08:00.000-04:002006-07-09T00:22:46.120-04:00गलत सीखएक दिन कथा सुनने गया और ये सुना। परशुराम के पिता जमदाग्नि को पत्नि रेनुका पर किसी बात पर क्रोध आ गया। उन्होंने पुत्रों को आदेश दिया माँ का सर काटने को। एक एक करके सब ने मना कर दिया। फिर परशुराम घर आए युद्ध से। पिता ने उन्हें आदेश दिया कि सब भाइयों और माँ का सर काटने को। परशुराम ने आज्ञा का पालन किया, सबको खतम कर दिया।<br /><br />फिर पिता इतने प्रसन्न हो गये कि वर दे दिया परशुराम को। परशुराम ने माँगा कि सब भाई और माँ जीवित हो जाएँ, और जो हुआ सब भूल जाएँ। पिता को पास इतनी क्षमता थी कि प्राण फिर निर्वाहित कर सकें, और सब फिर जी उठे, और सब कुछ सामान्य हो गया।<br /><br />बेहतर ये होता कि कहानीकार ने परशुराम से मना करवा दिया होता़, और किसी जरिये से पिता का क्रोध का दौरा खतम करवा दिया होता। <br /><br />आदर और भक्ति में फरक है। पिता की भक्ति करना मूरखता है। पिता आखिर आदमी ही है। आदमी को परमात्मा के पद पर बिठा देना बेकार की भावुकता है। हर आदमी उसी हालत में है जिसमें हम हैं। हमें उसी से सलाह या आदेश लेने चाहिए जो हमें ज्ञानी, समझदार, सयाना लगे। अगर कोई क्रोध के दौरे में पगला गया है, मूरखता की बात कर रहा है, तो वो उस समय मूरख है। उसके पास ताकत है और हमारी मजबूरी है तो बात और है, लेकिन अगर हम मूरख की मानेंगे भावुक बनके तो हम बड़े मूरख हैं। उसका दौरा तो उतर जाएगा, वो तो अपने आप को मना लेगा कि दौरा पड़ गया था, लेकिन हम कैसे अपने आप को मना पाएँगे? जब निर्णय खुद लिया तो फिर दूसरे को कोसने से क्या फायदा। <br /><br />हमारा धरम ऐसी भावुकताओं से भरा पड़ा है। धरम से समाज का ढाँचा बनता है। नतीजा ये हुआ कि हम लोग जहाँ भावुकता नहीं होनी चाहिए, वहाँ भावुकता का इस्तेमाल करते हैं। जब हम अपने नेता चुनते हैं, तो भावुकता के बूते पर, वो कौनसे परिवार से है, इसपर। कभी उन्होंने खुद को हमारा चाचा, बापु, वगैरह कह दिया था, इसलिए उनके वंशजों को हम अपना प्रतिनिधि बना लेते हैं। बताइये क्या आप डाक्टर या वकील भावुकता पर चुनेंगे? वो लोग हमारे जज़्बातों से खेल रहे थे, कुछ लक्ष साधने के लिए। अच्छा नेतृत्व, अच्छे अधयापक, अच्छे गुरु कभी जज़्बातों से नहीं खेलते। वो हमारी बुद्धि को जगाने की कोशिश करते है। फिर सही क्या है, गलत क्या है, ये हम खुद निर्णय कर सकते हैं।<br /><br />जहाँ कोमल भावुकता होनी चाहिए, पति पत्नि के बीच, आदर होना चाहिए परिवार में, वहाँ सास बहू के खेल चलते हैं। दहेज का व्यापार चलता है।<br /><br />ये सब उलटा पुलटा हो गया है। अब हमें सही सीख की जरूरत है।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12370525-115241896139506232?l=jaihanumanji.blogspot.com'/></div>jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.com7