28 November 2008

"कर मन मेरे सत व्यौहार"

सच के पीछे एक ताकत होती है। भारतीय समाज उस सच की ताकत को खो चुका है। सच की ताकत को खोने का तरीका है उसके विपरीत चलना, अपने हक के लिए घूस देना, कर्तव्य के लिए घूस लेना, असहाय को सताना, भोले, सच्चे को गुमराह करना वगैरह। सही रस्ता जानते बूझते गलत रस्ते पर चलने वाला भ्रष्ट है। उसका इलाज प्रायशचित है। गलत आदत को तोड़ना और सही आदत को बनाना प्रायशचित है। सच का मतलब वकीली सच नहीं। कोई शाब्दिक नाटक नहीं। सच का मतलाब सच्चे कर्म। सच्चा व्यवहार। जो करना था वो किया। जो नहीं करना था वो नहीं किया, परिस्थिती कैसी भी हो।

कैसे मालूम चले सच्चा क्या है या नहीं? वो अंतःकरण में महीन विचार है, जिसे करने से शांति मिलती है, चाहे कष्ट उठाना पड़े और ये ही तो परीक्षा है। वो दिल की आवाज़ है। जितना सुनेंगे उतना जोर पकड़ती जाएगी। वो गुरु का शबद है। वो अनहद नाद है। बुद्ध ने कहा है "अपने दीपक स्वयं बनो"। वो हिरदय का दीपक है। उसका आदर, उसका कहा मानना सच्चा व्यवहार है, भक्ति है।

वो मानव का सच्चा व्यवहार है। वो परमात्मा का संदेश है।

3 comments:

परमजीत बाली said...

सुन्दर विचार प्रेषित किए हैं।आभार।

Anonymous said...
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Rahul said...

Dosti Or Pyar Me Ek Bada Antar- Pyar Kehta h Agar Tumhe Kuch Ho Gaya To Mai Bhi Ji Nahi Paunga Jabki Dosti Kehti h Ki Bavkuf Mere Rehte Tujhe Kuch Nhi Hoga....