हम लोग मजाक बनाते थे कि धरमेंदर के आने पर शहर के सारे कुत्ते भाग जाया करते हैं। क्योंकि हर पिक्चर में वो बार बार "साले कुत्ते, तेरा खूऽऽन पी जाऊँगा" रटता रहता था।
अमरीका में दोस्ती करनी बहुत मुश्किल है। यहाँ आदमी पैसे, कर्जे, होड़, और प्रतिस्पर्द्धा के बुखार से बावरा है। और भी बुखार हैं, उनके बारे में बात ना ही की जाए तो बेहतर। सुना है भारत भी उसी दशा में जल्दी से जल्दी पहुँचने की कोशिश में है। आशा है भारत की यात्रा उस मंज़िल पर नहीं ले जाएग जहाँ अमरीका पहुँचा। क्योंकि जब एक आदमी दूसरे को केवल दुख, प्रतिस्पर्द्धा का, स्रोत देखता है तो फिर दोस्ती मुश्किल है। आदमी अकेला पड़ जाएगा, और भी दुखी हो जाएगा। शायद इसका नतीजा है की अमरीका में मानसिक रोग शायद दुनिया में सबसे ज्यादा होते हैं।
अब यहाँ दोस्ती करनी मुश्किल है, उसका नतीजा बच्चे को झेलना पड़ता है। उनकी भी दोस्ती नहीं हो पातीं, और उसका नतीजा यहाँ बच्चों की आपराधिक टोलियाँ बन जाती हैं। और सच तो यह है जिस तरह का यहाँ चाल चलन है अमरीकी बच्चों का, हम लोग अपने बच्चों को दूसरे देसी परिवारों के बच्चों से ही दोस्ती करने देते हैं।
तो हमारा नौ साल का छोटू बहुत कम हिंदी जानता है। देसी समुदाय के बच्चों के साथ खेलता है। एक दिन घर आया और मुझे पूछता है "डैड, वॉट इज़ द मीनिंग ऑफ 'साले कुत्ते'" ।
29 August 2006
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10 comments:
:)
Apane apna answer to bataya hi nahi!
कितना सुन्दर चित्रन किया है आपने दोस्ती का.वाकए मै आज भारत मै भी दोस्ती को पाना आसान नही है.बच्चे कितने भोले होते है ये साबित कर दिया आपके सुपुत्र ने.
अनिल शर्मा
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यह जो आपने इस प्रविष्ति मे लिखा है यह पूरा का पूरा मेरी स्वयं की कहानी है। ज्यादा विस्तार मे नहीं जाऊँगा किन्तु मैं खुद अमेरिका की इस संस्कृति का भुक्त-भोगी हूं।
आभार,
र ।
rajneesh.joshi@gmail.com
http://web.syr.edu/~rcjoshi
भाई आपने बलौग लिखना क्यों बंद कर दिया । आज कल आप क्या लिख रहे हैं ?
क्या आप ही तख्ती नामक साँफ्टवेअर के रचियता हैं ?
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Aap ki aashankaa sach ho chuki hai , is maamale men Bharat Amerikaa se bhi aage nikal rahaa hai. Kaalonee sanskriti badh rahii hai ,Mohallaa sanskriti khatam ho rahii hai|
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