03 July 2006

कुन्जी ३

यहाँ आपको ध्यान का निचोड़ देने की कोशिश की जा रही है। ये काम मेरे बस से शायद बाहर है, और गुरु की आज्ञा के बिना सिखाना, यानी गुरु बनना ठीक नहीं है। क्योंकि यहाँ गुरु चेले का सवाल ही नहीं, आप मुझे जानते ही नहीं, इसलिए लिखा। कोई जबरदस्ती नहीं है, जिसकी रुची हो इन मामलों में उन्हें ही आगे चलना चाहिए। नहीं तो तरक्की होगी ही नहीं समय बरबाद होगा। लेकिन इस पिंजड़े में से निकलने के साधन दे गयें हैं हमें ज्ञानी जन, इतना जानना बहुत है। जब जिज्ञासा जगे, तो कहीं कोई विधी है, ये जानना उपयोगी है। तब विधी ढूँढ करके इस्तेमाल की जा सकती है।

जब आप कहीं अकेले बैठे हों शान्त वातावरण में, तो जो "है सो है", उसका साक्षी बनकर अनुभव करने की कोशिश करें। शब्दार्थ न करने की कोशिश करें। जो विचार उठते हैं उन्हें सतर्कता से देखते रहें। कैसे एक विचार से दूसरा निकलता है, ये जानना जरूरी है। कैसे शुभ अशुभ विचार उठते हैं। इस क्षेत्र को जिसमें विचार भाव वगैरह उठते हैं, योग में अंतःकरण कहा गया है। इस विधी को योग में साक्षी ध्यान, और बौद्ध धर्म में विपस्सना कहा गया है।

मन को एक यन्त्र की तरह समझ पाना उपलब्धी है। ये इतना आसान नहीं है। शायद ही किसी को इतनी सिद्धी मिल पाती है। यन्त्र ढर्रे पर चलता है, हमें परेशान नहीं कर सकता। जब छोटी मोटी बात पर परेशान हुए तो पहचानना जरूरी है कि हम नियंत्रण खो गए थे यन्त्र पर, परेशान हम हुए, दुखी हम हुए, नुकसान हमारा हुआ। बड़ी मुसीबत पर तो बड़े बड़े परेशान हो जाते हैं, हम क्या चीज़ हैं।

2 Comments:

Blogger आलोक said...

कुन्जी
कुञ्जी या फिर कुंजी
c/जबरदस्ती/ज़बरदस्ती
c/रुची/रुचि
c/दे गयें हैं/दे गये हैं
c/विधी/विधि
c/उपलब्धी/उपलब्धि

निश्चय ही आपने जो लिखा है उसका भाव समझना ज़्यादा ज़रूरी है - हिज्जों के बजाय - पर मैंने एक ठानी है सो उपरोक्त लिखा।

July 04, 2006 12:34 AM  
Blogger jai hanuman said...

तो आपने खड़ी भाषा के पुलिसवाले (C सुरक्षाकर्मी) का बेड़ा उठा लिया। बढिया। जब तक रवैय्या सकारात्मक है तब तक किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

दसवीं के बाद कभी हिन्दी लिखी ही नहीं, और ये नतीजे हैं इसके। वैसे कुछ टंकण की गलती, और कुछ शब्द सचमुच आपने सही लिखना बताया।

July 04, 2006 12:29 PM  

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