24 June 2006

नेपाल में क्रान्ति

क्या कारण थे इसके?
अब आगे क्या?
सही नेतृत्व की क्या आवश्यक्तायें?

कारण थका हुआ, भ्रष्ट नेतृत्व था। जरूरी नहीं की इस राजा की गलती हो। जनता ने नेतृत्व पर लम्बे समय से विश्वास किया, आदर किया। नेतृत्व ने धोखा दिया। जो करना चाहिए था वो नहीं किया। जो नहीं करना चाहिए था वो किया। जनता के साथ विश्वासघात किया। आखिरकार जनता पक गई, और जो उस समय प्रतीक था, उसकी ताकत खतम कर दी।

इसका मतलब ये नहीं कि आने वाला नेतृत्व कोई अलग होगा। अगर हुआ तो किस्मत अचछी है। आसार कम हैं। नेतृत्व बदला नहीं है। वोही पुराने चेहरे जो पेहले भी कुछ नहीं कर पाए।

क्रान्ति लाना इतना मुश्किल नहीं है भावुक समाज में। ये चापलूसी रवैय्या है। पेड़ उगने में बीस साल लगते हैं, काटने में एक घण्टा। आग लगाना आसान है, बुझाना और निर्माण करना मुश्किल। घाव करना आसान है, भरना मुश्किल। सकारात्मत रवैय्या, जिस्से सबका भला हो, उसकी जरूरत है। उसके लिए प्रणाली, यानि सिस्टम बनाने पड़ते हैं। जो सही में काम करें बिना सेटिंग के। अगर फोन ठीक कराने है तो मिस्त्री को घूस देने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। वो ताकत का दुरुपयोग है, दुख पहुँचाएगा ही। उससे मारामारी फैलेगी ही समाज में। मारामारी के फैलने से उपद्रव में भला आदमी भी मरेगा। अगर बच्चे को पाठशाला भेजना हो तो नाक रगड़ने पर बात नहीं आनी चाहिए। मामला सहज होना चाहिए। रोज का जीवन साफ, हलका, सहज होना चाहिए। ये अच्छे नेतृत्व द्वारे बनाये हुए सिस्टम हैं। ये दुख कम करने के लिए किए हुए काम हैं।

जनता को भावुकता की शराब पिला के, नकारामत्मक शिक्षा के बाद अब जादू से स्वर्ण युग नहीं आ जाएगा। अगर हालत खराब है तो उसके पीछे लम्बा इतिहास है, कारण हैं, परिस्थितियाँ है। नेतृत्व के गलत निर्णय हैं। अच्छा नेतृत्व सबके भले की सोचता है। समुदायों में में सेतु बनाता है। जो पीढी अभी आई नहीं उसके लिए कुछ नींव छोड़ता है। शुभ भाव होनें चाहिएँ। ये जादू से नहीं आते। इनके पीछे कारण और परिस्थितियाँ होती हैं।

सबसे जरूरी है सबके लिए अनुकूल शिक्षा। अमीर का बच्चा कुछ सीखे और गरीब का बच्चा कुछ और, ये सही व्यवस्था नहीं है। बच्चे पर अतीत लोदना, माँबाप की गरीबी के कारण खटारा शिक्षा थोंपना अत्याचार है। कोई समाज कितना न्यायी है इसका अच्छा अन्दाजा आप ये देख के लगा सकते हैं कि वहाँ गरीब बच्चे के हुनर को पनपने का मौका दिया जाता है या नहीं। पद पहुँचने में काम आखिर हुनर आता है या सेटिंग?

ये सब ठीक से करने की लिए नेतृत्व की बुद्धि साफ होनी चाहिए। क्या सही गलत है ये बुद्धि है। ये करने से सुख होगा या दुख, ये बुद्धि है। बिना इसके सही, सम्यक नेतृत्व सम्भव है ही नहीं। केवल बुद्धि ही नहीं आत्मविश्वास की भी जरूरत है, लेकिन आत्मविश्वास चापलूस को भी हो सकता है। चोर, भावुकता से खिलवाड़ करने वाले, समुदायों में दरार डालने वाले, गुटबाजी करने वाले कभी अच्छा नेतृत्व नहीं दे सकते। चापलूसी और भावुकता दूश्मन हैं सम्यक बुद्धि के। जब अपने मन में ही गंदगी, चापलूसी भरी होगी तो क्या कोई समाज का रखरखाव कर पाएगा?

चिन्ता की बात ये है कि जो बीज नेपाल में तूफान लाए वोही भारत में भी हैं।

3 comments:

अनुनाद सिंह said...

नेपाल में शान्ति और विकास भारत के अत्यन्त हित में है | नये तन्त्र के साथ नेपाल के सम्यक विकास हो , यही कामना है |

Sunil Deepak said...

अनुनाद की शुभकामनाओं में मैं भी अपनी आशाएँ जोड़ता हूँ. अपने नेपालीं मित्रों को जब इस क्राँती से आये बदलाव के बारे में उत्साहित सुनता हूँ और उनकी आशाएँ की सारी व्यवस्था बदल जायेगी की उम्मीदों के बारे में पढ़ता हूँ तो यही डर लगता है कि यह आशाएँ एक बार फ़िर से अधूरी न रह जायें.

संजय बेंगाणी said...

बन्दुक उठा लेना आसान हैं और एक अच्छी व्यवस्था स्थापित करना उतना ही मुश्किल. नेपाल में लोगो कि आशाएं चरम पर होगी, जिन्हे पुरा करना कतई आसान नहीं हैं.