भारत को चाहिए किर्किट से अवकाश
हद हो गई यार इतना पैसा ये खिलाड़ी कमाने लगे साबुन मंजन बेच के की साफ है खेलने में मन ना लगे इनका। जितना समय हम लोग इस वाहियाद खेल पर लगाते हैं, ये एक सामाजिक चस्का बन गया है। खिलाड़ियों का मन खेल में है नहीं। वो खेल के बाहर संचार माध्यमों में गिल्ली दंडा में ज्यादा रुची रखते हैं। बेतुकापन,भावुकपना और गैर जिम्मेवारी हमारे मीडिया का दूसरा नाम हो सकता है। जो बिके उसे और बेचो। अगर लोगों को किर्किट का चस्का लग गया है तो उस आग में और घासलेट डालो।
आप में से ज्यादातर को याद नहीं होगा की टीवी से पहले भारत में और खेल भी खेले जाते थे। मैं छोटा था, यादें धुंधली हैं, मगर हम लोग रेडियो पर हॉकी, फुटबॉल उतने ही शौक से सुनते थे जितने किर्किट।
हुआ यूँ की किर्किट टीवी पर छा गया और बाकी सब को कुचल दिया मार्केटिंग और रोकड़े नें। किर्किट पाँच दिन चलता था, अच्छा टाइम पास था। फुटबॉल हाकी डेड़ दो घण्टा चलते थे, इसलिए किर्किट छा गया। फुटबॉल हाकी में कमसेकम मेहनती टीम, हट्टी कट्टी टीम के जीतने की ज्यादा संभावना तो होती है? सिवाय भारतीय उपमहाद्वीप के किर्किट टोटल फेल रहा है। बाकी दुनिया फुटबॉल विश्व कप मना रही हम धौनी की ज़ुल्फों में मस्त हें। धौनी जो खेले न खेले वो अलग। उसका मार्किट ऐसे हौ ऊपर चढ गया।
अब क्यों किर्किट ने कुचल डाले बाकी खेल भारत में, इस पर तो किताब लिखी जा सकती है। कुछ मिनट में सामाजिक मनोविज्ञान करने की कोशिश करता हूँ। जाहिर है इससे मेरे नए दोस्त नहीं बनेंगे, पुराने शायद चिढ जाएँ।
किर्किट निठल्लों का खेल है। आलसियों की बाछें खिल गईं। अरे यार किस वेले नें ये ५ दिन का खेल बनाया? कभी कभी तो छह दिन का भी हो जाता है। अब शरम से एक दिवसीय ज्यादा होने लगे हैं। फुटबॉल हाकी में व्यायाम इतना होता है कि २ घण्टे से ज्यादा खिलाड़ी खेल ही नहीं सकता। खिलाड़ी थका कि बाहर। एक मैच ठीक नहीं खेला कि बाहर। ये किर्किट अजीब है की खिलाड़ी मीडिया में प्रतिष्ठा पर गाड़ी खींच लेते हैं। और जातपात के कारण हमारे यहाँ शारीरिक स्पर्ष से लोगों के मन में घिन है। किर्किट इस वजह से भारत को जँचा। खिलाड़ी लम्बी पौशाक पहन के, निरर्थक रस्में करते रहते हैं। ये हमारे समाज को भाया।
हम लोगों को बेसिरपैर के टोटकों में मजा आता है। अस्सी साल के जवान जिन्का दिमाग कुन्द हो गया है, हमारे देश के करोड़ों का जीवन संभालते हैं, क्योंकि हम उनपर भावुक कारणों से विश्वास करते हैं। भावुकता बुद्धि नष्ट कर देती है तो हमारी राजनीति का कोई सिरपैर न था न है। आप हमारे धरम देखें तो वहाँ भी येही मिलेगा। तोते की तरह रटे जा रहे हैं। बात में कितना दम है, कोइ सिरपैर है कि नहीं इससे कोई मतलब नहीं। जो सीधी सटीक बात करते हैं वो हमारे समाज में ज्यादा नहीं चल पाते। जो उलटी सीधी, भावुक, अंधविश्वासी बात करते हैं उनकी चलती है। नेता लोग तांत्रिकों पर विश्वास करते हैं, हुनर पर, नेतृत्व पर नहीं। नए घर में बिजली हो न हो, सूखा नींबू जरूर मिलेगा दरवाजे पर। ये सब प्रमाण है कि हमें आत्मविश्वास की कमी है। अपने सीधीपन से किये हुए काम पर विश्वास नहीं है। और ये टोटके बचेखुछे आत्मविश्वास को भी नष्ट करदेते हैं। हुनर हम उसी कलाकार का मानते हैं जिसे अंग्रेज ने शाबाशी दी हो। नहीं तो कलाकार बेकार है।
अगर हमें सहज बुद्धि यानि कॉमन सेंस को बढावा देना है तो इन टोटकों को छोड़ना पड़ेगा। बिना उसके सम्यक आत्मविश्वास बनना मुशकिल है। इन टोटकों में हमारा भावुक पूँजीनिवेष किया जा चुका है। जैसे जुआरी या शराबी को लत छड़ाने के लिए कुछ दिन इनके जिक्र से भी दूर रखना पड़ता है, तब जाके वो अपना संतुलन पाके और कुछ कर पाता है। अगर जुआरी बुद्धि का इस्तेमाल कर पाता तो कबका छोड़ दिया होता। बुद्धि को ही तो नहीं जगने देता जुए का नशा़।
अब किर्किट से २ साल का अवकाश भारत को चाहिए।
आप में से ज्यादातर को याद नहीं होगा की टीवी से पहले भारत में और खेल भी खेले जाते थे। मैं छोटा था, यादें धुंधली हैं, मगर हम लोग रेडियो पर हॉकी, फुटबॉल उतने ही शौक से सुनते थे जितने किर्किट।
हुआ यूँ की किर्किट टीवी पर छा गया और बाकी सब को कुचल दिया मार्केटिंग और रोकड़े नें। किर्किट पाँच दिन चलता था, अच्छा टाइम पास था। फुटबॉल हाकी डेड़ दो घण्टा चलते थे, इसलिए किर्किट छा गया। फुटबॉल हाकी में कमसेकम मेहनती टीम, हट्टी कट्टी टीम के जीतने की ज्यादा संभावना तो होती है? सिवाय भारतीय उपमहाद्वीप के किर्किट टोटल फेल रहा है। बाकी दुनिया फुटबॉल विश्व कप मना रही हम धौनी की ज़ुल्फों में मस्त हें। धौनी जो खेले न खेले वो अलग। उसका मार्किट ऐसे हौ ऊपर चढ गया।
अब क्यों किर्किट ने कुचल डाले बाकी खेल भारत में, इस पर तो किताब लिखी जा सकती है। कुछ मिनट में सामाजिक मनोविज्ञान करने की कोशिश करता हूँ। जाहिर है इससे मेरे नए दोस्त नहीं बनेंगे, पुराने शायद चिढ जाएँ।
किर्किट निठल्लों का खेल है। आलसियों की बाछें खिल गईं। अरे यार किस वेले नें ये ५ दिन का खेल बनाया? कभी कभी तो छह दिन का भी हो जाता है। अब शरम से एक दिवसीय ज्यादा होने लगे हैं। फुटबॉल हाकी में व्यायाम इतना होता है कि २ घण्टे से ज्यादा खिलाड़ी खेल ही नहीं सकता। खिलाड़ी थका कि बाहर। एक मैच ठीक नहीं खेला कि बाहर। ये किर्किट अजीब है की खिलाड़ी मीडिया में प्रतिष्ठा पर गाड़ी खींच लेते हैं। और जातपात के कारण हमारे यहाँ शारीरिक स्पर्ष से लोगों के मन में घिन है। किर्किट इस वजह से भारत को जँचा। खिलाड़ी लम्बी पौशाक पहन के, निरर्थक रस्में करते रहते हैं। ये हमारे समाज को भाया।
हम लोगों को बेसिरपैर के टोटकों में मजा आता है। अस्सी साल के जवान जिन्का दिमाग कुन्द हो गया है, हमारे देश के करोड़ों का जीवन संभालते हैं, क्योंकि हम उनपर भावुक कारणों से विश्वास करते हैं। भावुकता बुद्धि नष्ट कर देती है तो हमारी राजनीति का कोई सिरपैर न था न है। आप हमारे धरम देखें तो वहाँ भी येही मिलेगा। तोते की तरह रटे जा रहे हैं। बात में कितना दम है, कोइ सिरपैर है कि नहीं इससे कोई मतलब नहीं। जो सीधी सटीक बात करते हैं वो हमारे समाज में ज्यादा नहीं चल पाते। जो उलटी सीधी, भावुक, अंधविश्वासी बात करते हैं उनकी चलती है। नेता लोग तांत्रिकों पर विश्वास करते हैं, हुनर पर, नेतृत्व पर नहीं। नए घर में बिजली हो न हो, सूखा नींबू जरूर मिलेगा दरवाजे पर। ये सब प्रमाण है कि हमें आत्मविश्वास की कमी है। अपने सीधीपन से किये हुए काम पर विश्वास नहीं है। और ये टोटके बचेखुछे आत्मविश्वास को भी नष्ट करदेते हैं। हुनर हम उसी कलाकार का मानते हैं जिसे अंग्रेज ने शाबाशी दी हो। नहीं तो कलाकार बेकार है।
अगर हमें सहज बुद्धि यानि कॉमन सेंस को बढावा देना है तो इन टोटकों को छोड़ना पड़ेगा। बिना उसके सम्यक आत्मविश्वास बनना मुशकिल है। इन टोटकों में हमारा भावुक पूँजीनिवेष किया जा चुका है। जैसे जुआरी या शराबी को लत छड़ाने के लिए कुछ दिन इनके जिक्र से भी दूर रखना पड़ता है, तब जाके वो अपना संतुलन पाके और कुछ कर पाता है। अगर जुआरी बुद्धि का इस्तेमाल कर पाता तो कबका छोड़ दिया होता। बुद्धि को ही तो नहीं जगने देता जुए का नशा़।
अब किर्किट से २ साल का अवकाश भारत को चाहिए।

3 Comments:
किर्किट निठल्लों का खेल है।
ये बात सही है।अवकाश तो बीस साल का होना चाहिये।
आपकी यह प्रविष्टी मैंने अपनी इस पत्रिका में डाल ली है। आशा है कि आप को एतराज़ नहीं होगा। बहुत अच्छा लिखा है। वर्तनी का थोड़ा ध्यान रखें।
बिलकुल एतराज़ नहीं साहब। आपको अच्छा लगा ये बहुत है।
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