18 June 2006

कुन्जी २

कुन्जी २
ये आपको कोई भी बता देगा की ये "मैं" ही दुख की जड़ है। मैंने यहाँ इस दुख के पिंजड़े से निकलने का भी रस्ता बताने की कोशिश की है।

मजे की बात ये है कि ये "मैं" आपको बचा भी सकता है। जब ये आग नियन्त्रण के बाहर है तो दुख है ये आपका घर जला देगी। जब ये वश में है तो सुख है आपकी रोटी पका देगी। किसके वश में? अपने आप के वश में।

और भी रस्ते हो सकते हैं, वो नक्शा मेरे पास नहीं है। यहाँ मुझे जो सबसे प्राकृतिक रस्ता लगा, जिसने मेरा दरद खतम किया, बता दिया। बाकी परमात्मा का जिस पर आशीरवाद है उसी की नाँव तरेगी।

गुरु नानक कह गए हैं कि "मन जीता जग जीत"।

मन ही मन को जीत रहा है। मन ही मन को समझ रहा है।

इस छोटे मैं के पीछे क्या है? बड़ा मैं, जिसे योग में द्रष्टा कहा गया है। असल में छोटा मैं गलतफहमी है, भय है। छोटे मैं में जीवन के प्रकाश की शक्ति नहीं है। जीवन प्रकाश द्रष्टा से हो रहा है। कम से कम ऐसा लगता तो है।

ये मैं ही बीमारी है। ये मैं ही दवा है। ये मैं ही औजार है। ये मैं ही अभ्यास है। ये मैं ही नक्शा है। ये मैं ही शुरुआत है और ये मैं ही लक्ष है। लेकिन जिस मैं से शुरु होते हैं वो काफी बदल जाता है। जैसे भद्दा कीड़ा सुन्दर तितली में बदल जाता है। पहले ये मैं गंदगी से भरा था। अब प्रेम से भरा है। घड़ा वोही है पानी बदल गया है। घड़ा टूट के अपना व्यक्तित्तव नहीं भूल गया है। अब भी वोही बीबी बच्चे हैं, वोही नौकरी, वोही माँ बाप। कुछ बदल गया है, कुछ खुल गया है, लेकिन वो समझाना मुशकिल है। कच्चा आम खट्टा और बेस्वाद था। अब पक गया है मीठा हो गया है। आम वोही है। ये सब प्राकृतिक है।

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