17 June 2006

भूल भुलय्या की कुन्जी

बच्चा जब जनम लेता है तो पशु से ज्यादा दूर नहीं होता। भूख लगी तो रो देगा। पेट में दरद हुआ तो रो देगा। नहीं तो चुपचाप शान्त पड़ा रहेगा। फिर एक दिन चमत्कार होता है। बच्चा माता पिता को पहचानने लगता है। चमत्कार ये है कि अब पहचानने वाले का निर्माण हो गया है। अब उसका "मैं" बन गया। ये "मैं" उसकी अपने मन में अपनी तस्वीर है। बच्चा पहले भी था। लेकिन उसमें अपने बारे में तस्वीर नहीं थी। बच्चे का मनोवैजज्ञानिक रूप से जनम हो गया। अब वो अलग है। अब उसकी मुसीबतें शुरू हो गयीं। अब उसका चैन खतम हो गया। अब सिर्फ भूख लगने पर ही नहीं परेशान करेगा। अब कल्पना करेगा और परेशान करेगा। समय और ध्यान माँगेगा। हँसेगा, खेलेगा, लड़ेगा। अब उसका व्यक्तित्व बनना शुरू हो गया। इसमें बहुत हद तक पहले से बना हुआ आता है। कुछ बच्चे प्रकृति से शान्त होते हैं, कुछ शैतान, वगैरह।

बिना इस "मैं" के बच्चा प्राकृतिक इच्छाओं को वश में नहीं कर सकता। बिना इसके उसमें पशु का स्वभाव है। इसके साथ भी पशु का स्वभाव हो सकता है अगर सही परिस्थिती नहीं मिलीं। वो माता पिता, शिक्षा, संस्कृति से सीख के इंसान बनेगा। मनुष्य और पशु में ये ही फरक है कि मनुष्य अपनी प्राकृतिक इच्छाओं को वश में कर सकता है। कुत्ता कुत्ता ही रहेगा। कभी कहीं किसी मौके पर कुत्ता भलाई का काम कर देगा। वोभी तब अगर कुत्ता आदमी के साथ पला है। अब उसमें आदमी के कुछ गुण आ गये।

प्रकृति का सबसे बड़ा चमत्कार ये "मैं" है । भौतिकी कहते हैं ब्रह्माण्ड को बने १४०० करोड़ वर्ष हो चुके हैं। इस "मैं" को बनने में १४०० करोड़ वर्ष लगे हैं। केवल इस "मैं" में ही जगने की क्षमता है। हम इस "मैं" का सही इस्तेमाल कर सकें। ये "मैं" दुनिया में चैन का स्रोत बन सके।

जब ये "मैं", "मैं" को ढूँढेगा, टटोलेगा, तो योगी हुआ। जब "मैं" "मैं" को पा लेगा, समझ जाएगा, तो चैन पाया। फिर उसके जीवन का असली काम शुरु हुआ।

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