21 March 2006

पैंसठ साल के जवान

ये हमारे देश की खासियत है। पैंसठ साल के बूढे अपने आप को जवान मानते हैं। नहीं तो फिर क्यों पैंसठ साल के बूढे अपने आप को युवा नेता कहलाते?

भविष्य दिनबदिन गढ्ढे में गिरता जा रहा है। आखिर क्या किया है इन नेताओं ने भारत के लिए? शायद हम लोगों में नेतृत्व की कमी है। आपको इतिहास की किताबों में ये कोई नहीं बताएगा की हमारे राजा इतने लीचड़ और अन्यायी थे की अंग्रेजों के आने पर जनता ने राहत महसूस की। जनता ने स्वागत किया न्याय का। शायद आप ये न जानते होंगे की १८५७ में हार का असली कारण ये था की बगावतीयों ने लूटमार, और ताकत का दुरोपयोग शुरु कर दिया था। वे जनता का सहयोग खो चुके थे।

हमें ये बड़ा गर्व है प्राचीन भारत पर। जवानों को इन भावुकता के जालों में से बचना चाहिये। ये वोही प्राचीन भारत है जहाँ पर असहाय विधवाओं को जला दिया जाता था। जहाँ शूद्र के कान में सीसा डाला जाता था वेद सुनने पर। आपका भविष्य आपका है। केवल आपका अतीत आपका है। ये हजारों सालों की मूरखता आपकी नहीं है। मूरखों के हाथ में राजनैतिक बल न जाने दें। कोई किसी परिवार का है या किसी धरम का, अगर इस कसौटी पर हम लोग ताकत इनको सौंपेंगे तो जिम्मेदार हम हैं इस लीचड़ नेतृत्व के।

अगर आप भारत के पुराने शहरों में जाएँ तो पाएँगे हमारे असली मानसिकता। कोई एक पौधा तक लगाने के लिए तैयार नहीँ है क़ौम के लिए। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो खूब जंगल थे। वो जंगल आज़ादी के बाद काले धन में बदल गए। जितनी रेल अंग्रेजों ने भारत में छोड़ीं, उससे शायद ५ प्रतिशत भी ज्यादा नहीं बना पाए हैं हमारे नेता। पैसा जरूर खर्च किया है। करजा जरूर लिया है। सबकी हवेलियाँ बन गईं।

क्या बचा है जवानों के लिए? शराब से भरी थैलीयाँ और कुक्कड़। वनडे मैच। अश्लील पिक्चरें जहाँ अब लगता है गोरी चमड़ी का नाच का फैशन है। नंगी तस्वीरों से भरे अखबार।

जवानों, ये समाज पहले से ही भ्रष्ट था, और अब और ज्यादा भ्रष्ट हो रहा है। एक तुम पर ही उम्मीद की जा सकती है। पहाड़ पर चढना हो तो पहला कदम घर की सुरक्षा से बाहर जो लिया, वो सबसे महत्वपूरण है। हर आदमी बुद्ध नहीं बन सकता। हर आदमी अमिताभ नहीं बन सकता। लेकिन हम अपनी तरफ से कहीं कोई बदलाव ला सकते हैं। हर पेड़ की शुरुआत कहीं किसी बीज से हुई थी। धरम का मतलब आँख मूँद के बैठ जाना नहीं है। ये सबको मालूम है क्या सही है क्या गलत है। अब इसको बाहर भी चमकने का मौका मिले। तब ये भारत गर्व करने लायक होगा। मूरख अतीत का गर्व करते हैं। बुद्धिमान लोग वर्तमान को कर्म से चमकाते हैं।

अगर युवाओं को भविष्य उजाला करना हो तो राजनीति में उतरना पड़ेगा। अगर दस साल बाद आप आम खाना चाहते हैं तो गुठली किसी को तो बोनी ही पड़ेगी। अपने गाँव कसबों में, जहाँ हो सके राजनीति में उतर जाओ और ईमानदारी के वातावरण की माँग करो। अकेले हीरो बनने की कोई जरूरत नहीं है समूह में ताकत होती है। बूंड बूंद से घड़ा भर जाता है। नेताओं को लगना चाहिये की जनता की नजर उन पर है। जब बुद्धिमान लोग, जवान लोग, संवेदनशील लोग समाज में रुचि लेना शुरु करेंगे तो धीरे धीरे ये रामराज बन जाएगा, नहीं तो ये नरक बन जाएगा। और कोई रास्ता नहीं।

6 comments:

Sagar Chand Nahar said...

भाई साहब इतिहास इतना भी बुरा नहीं है हमारा कि जिस पर गर्व नहीं किया जा सके, हां यह मानता हुं कि शुद्रों के कान मे सीसा डालना ओर असहाय विधवाओं को जला देना हमारे लिये कलंक हे परन्तु कई बातें गौरव करने के लायक भी है.
प्रथ्वी राज चौहान ने मो. गोरी को सोलह बार युद्ध में परास्त कर क्षमा किया ओर सत्रहवी बार हारे. क्या गोरी को माफ़ कर छोड देना उनकी मुर्खता थी? इस लिये उस गौरवशाली इतिहास के बारे मे अगर युवा पीढी को नहीं बताया जाय तो सही नही होगा.
आपने युवा पीढी को राजनीती मे आने का आह्वान किया परन्तु लगता है इस देश की मिट्टी में ही भ्रष्टाचार मिल गया है जो भी राजनीति मे जाता है वह उसी रंग मे घुल मिल सा जाता है, आज के ये बुढ्ढे नेता पचास वर्ष पहले अपनी जवानी मे राजनीती मे कुदे थे परन्तु उन्होने कौनसे प्याज उगा दिये? राजनीती वो दलदल है जो दाराशिकोह जैसे विद्वान को अपने ही भाई ओरंगज़ेब के हाथों मरवा सकता है, ओर अपने ही पिता को कैद मे डाल सकता है.
आज के नेताओं कि बात ले लें आप आज का किस युवा नेता से आप अच्छे कामों या अच्छे आचरण की उम्मीद कर सकते हैं?????
मेरी भाषा शैली या विचारों से आपको या पाठकों को ठेस लगी हो तो क्षमा याचना करता हुं

jai hanuman said...

आपका भरपूर स्वागत है छाती ठोक के हमारी निन्दा कीजिए। हम वैसे भी नाज़ुक मिजाज़ नहीं हैं। जहाँ तक आपका सवाल पृथवीराज के बारे में, तो मेरा विचार है कि हाँ, उन्होंने बहुत बड़ी गलती की। वो बहुत महँगी पड़ी भारत को। हाँ ताकत आदमी को जल्दी भ्रष्ट कर देती है। लेकिन मैं उसमें सतर्क रुचि लेने की बात कर रहा था, फँसने की नहीं। हमें मालूम रहे क्या निर्णय लिये जा रहे हैं। अफसर ईमानदारी से काम कर रहे हैं। आरथिक साधनों साधनों का सही इस्तेमाल हो रहा है।
जैसे बूढे शेर को युवा शेर गद्दी से हटा देतें हैं, ये कुदरती है। इसमें कोई बुराई नहीं है। वृद्ध जनों की उमर है नाती पोतियों के साथ समय गुजारने की। अब जवानों को मौका दें? बदलाव कुदरत का नियम है। पुराना थक गया है तो अब नया खून उत्साह लाएगा। पुराना फेल हो चुका है। और कुछ हो न हो, पुराने को तो हटाना ही पड़ेगा। नया अच्छा भी हो सकता है बुरा भी। लेकिन उम्मीद तो है। इन बूढे तोतों से कोई उम्मीद नहीं।

हाँ ये बात सही है कि अतीत इतना बुरा भी नहीं है। हमें सचेत रहने की आदत डालनी है। जो सही वो हमें साफ सही दिखे। जो बकवास है वो हम साफ देख सकें। यानी की हमारी बुद्धी भावुकता के तूफान में न खो जाए। हम अपने भावों के प्रति सचेत रह सकें। भावुकता बुद्धि का नाश कर देती है।

Sagar Chand Nahar said...

सही बात है आपकी, नये पत्ते तब ही आते है जब पुराने जड जाते है, परन्तु वाह रे भारत की राजनीती इसमे पतझड कभी आता ही नही,बाकि ज्योती बसु तो अब भी देश के प्रधान मंत्री बनने की उम्मीद पाले बैठे है, राजा भेय्या जैसे महान युवा नेता भी विधान सभा या संसद की शोभा बढा रहे है,राहुल गांधी, मिलिन्द देवडा, सचिन पायलट ओर उमर अब्दुल्ला जैसे युवा नेताओं से बडी उम्मीदें थी परन्तु सब बेकार, संसद मे उनसे तो बोला भी नही जाता हां कभी कभी सिद्धु अपनी झलक दिखा देते है............ भगवान करे आपकी उम्मीद सफ़ल हो ओर देश को नया कर्णधार मिले. ओर इन बुढ्ढों से देश को मुक्ति मिले.

रजनीश मंगला said...

हनुमान भईया, आपकी ये प्रविष्टी सबके लिए बहुत उपयोगी और महत्वपूर्ण है। मैं अपनी तरफ़ से ऐसा कुछ कर रहा हूँ।

ई-छाया said...

मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ. बहुत बढियां, लिखते रहें.

Anonymous said...

Dear Sir:

We couldn't find your contact information and that is why we decided to contact you via your blog. We are writing to ask for permission to use text from your blog posted on March 21 2006 in the production of Hindi language-teaching materials for non-profit educational use.

We are developers of foreign language training materials for learners of various languages at academic institutions and for employees of the U.S. government. We would like to include portions of articles from your blog in our lesson units for print and online publication. The materials would represent only incidental parts of our work. In the acknowledgement section of our language-teaching materials and in related documentation we would include the appropriate copyright notice: "Courtesy of: (your name here).

These materials will be used for non-profit educational purposes only. They will not be made available to any commercial parties for commercial use. We would appreciate a written response by email or fax from you allowing us to use your product in this manner, sent by one of the following means:

1. by e-mail: aszczepanek@icls.com

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All we would need from you, in case you agree, is a short email telling us that you allow us to use the text you published on this blog. In case you rather we would not use the text, could you please let us know as well.

Please feel free to contact me to clarify any questions you may have. Thank you for your time and consideration. We look forward to hearing from you.

Sincerely,

Anna M Szczepanek