जीवन हमारे वश में नहीं है। पहलवानों तक को लकवा मार जाता है। अगली साँस आएगी कि नहीं, कुछ गारण्टी नहीं। हम कहाँ पैदा हुए, किसके घर में, कैसे शरीर में, कुछ भी हमारे वश में नहीं है। कोई बच्चा अन्धा पैदा हुआ। वो बच्चा हम भी हो सकते थे।
हम किससे मिलेंगे हमारे वश में नहीं है। कल को हो सकता है कोई संत हमारे जीवन में आ जाए। या हो सकता है कोई मूरख हमसे टकरा जाए। कोई खुशखबरी आ जाए। कोई कलेश आ जाए।
कौन से लोग हमारे दोस्त बन जाएँ, क्या मालूम। ये वातावरण, संगी साथी, ही हमारे मन को आकार देते हैं। हमारा मन कैसा है, इस पर हमारा मामूली सा वश है। लेकिन इस मन को अच्छे या बुरे रास्ते पर कौन लाया था? क्या वो वाकया हमारे वश में था? नहीं, ऐसा नहीं था। ये सब हो गया। ऐसा विलयात की किताबों में फैशन चल पड़ा है, कि जो हुआ, इसलिए हुआ क्योंकि आपने ये चाहा था। कौन चाहेगा की उसका बच्चा अंधा पैदा हो? कौन चाहेगा कि सुनामी में लाखों तबाह हि जाएँ? जीवन महारहस्य है। एक के घर में राम पैदा होता है, एक के घर में रावण। कुछ भी हो जाता है। जो कहता है जीवन के कारणों और परिस्थितियों के क्रम को समझ गया है, समझ लेना कि फेंक रहा है।
हम अपनी परिस्थिती पर घमण्ड न करें। हम अपनी परिस्थिती पर ग्लानी न करें। हम दूसरे की परिस्थिती पर जलन न करें। हम दूसरे की दुख पर सहानुभूति कर सकें। परिस्थिती बदलेगी। जीवन अस्थिर है। परिस्थिती को वश करने के लिए बावले हुए फिर रहे हैं जिनके हाथ में तुक्के से कुछ ताकत आ गयी है। अब ये बावलापन उबल के सामने आ रहा है समाज में। पेड़ उगने में बीस साल लगते हैं, काटने में एक घण्टा। बावला हो जाना आसान है। फिर स्वस्थ होना उतना आसान नहीं है। हम निम्रता से जी सकें। यदि जीवन हमें ताकत दे तो उसके साथ निम्रता भी दे सके। इस बन्दर को उस्तरा न मिल सके। और मिले तो अकल भी साथ में मिल सके।
आशा और उत्साह से जलाया हुआ दीपक रौशनी फैलाएगा ही। आम की गुठली बोने से आम उगेगा ही। मैत्री और प्रेम से जिया हुआ जीवन सुख फैलाएगा ही। जो दूसरों के सुख के लिए जीएगा वो सुखी होगा ही।
20 February 2006
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1 comments:
उदारता अवश्य ही पूजनीय है , साध्य है , महानता की जननी है |
अनुनाद
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