बड़ी धमकियाँ
ये किस्सा मेरे सामने हुआ ।
मेरठ से ग़ाज़ियाबाद की बस में मैं शाम के समय आ रहा था । सरकारी बस थी, खटारा, शोर मचाती हुई । जब बस ग़ाज़ियाबाद के पास पहुँची तो कई लड़के चढ़े । एक एक करके कंडक्टर ने उन्हें टिकट दिया । एक कुछ हीरो टाइप था । उसने टिकट खरीदने से मना कर दिया । "मैं नहीं देता पैसे" , उसने साफ कह दिया, ग़ाज़ियाबादी पत्थर मार भाषा में । कंडक्टर ने बहुत समझाया, "बेटा, बस में पैसा तो देना ही पड़ता है, मुफ्त में नहीं चढ़ सकते" । लड़का बोला "मैं तो स्टाफ का हूँ" । कंडक्टर बोला, "तो अपना कार्ड दिखा ?" । लड़का फेंक रहा था । होते होते गरमा गरमी हो गयी ।
लड़का बोला " मैं तुझे गोली मार दूँगा, मेरे से पंगा मत ले ।"
कंडक्टर बोला, "अबे छोड़, दो रुपय का टिकट खरीदने में तो तेरे पेट में दरद हो रहा है, बीस रुपय की गोली क्या खरीदेगा ?"
मेरठ से ग़ाज़ियाबाद की बस में मैं शाम के समय आ रहा था । सरकारी बस थी, खटारा, शोर मचाती हुई । जब बस ग़ाज़ियाबाद के पास पहुँची तो कई लड़के चढ़े । एक एक करके कंडक्टर ने उन्हें टिकट दिया । एक कुछ हीरो टाइप था । उसने टिकट खरीदने से मना कर दिया । "मैं नहीं देता पैसे" , उसने साफ कह दिया, ग़ाज़ियाबादी पत्थर मार भाषा में । कंडक्टर ने बहुत समझाया, "बेटा, बस में पैसा तो देना ही पड़ता है, मुफ्त में नहीं चढ़ सकते" । लड़का बोला "मैं तो स्टाफ का हूँ" । कंडक्टर बोला, "तो अपना कार्ड दिखा ?" । लड़का फेंक रहा था । होते होते गरमा गरमी हो गयी ।
लड़का बोला " मैं तुझे गोली मार दूँगा, मेरे से पंगा मत ले ।"
कंडक्टर बोला, "अबे छोड़, दो रुपय का टिकट खरीदने में तो तेरे पेट में दरद हो रहा है, बीस रुपय की गोली क्या खरीदेगा ?"

2 Comments:
वाह! मान गए।
इससे याद आया दिल्ली में बस में हुआ वाकया।
बस में बैठे दो लोग आपस में किसी राजनैतिक मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे। बीच में कण्डक्टर भी शामिल हो गया। तो लोग भौंचक्क रह गए। फिर कण्डक्टर बोला, 'हम कण्डक्टर हैं, तो? अखबार तो हम भी पढ़ते हैं। तुम भी तो अखबार पढ़ के ही भाषण दे रहे हो।' फिर अच्छा खासा पाठ पढ़ाया कण्डक्टरों की छवि और वास्तविकता के ऊपर।
ये वाकई बहुत मजेदार था।
Post a Comment
<< Home