08 September 2005

ना माँगू सोना चाँदी

बचपन में सुना हुआ गाना....

ना माँगू सोना चाँदी
ना माँगू बंगला गाड़ी
ये मेरे किस काम के ।

ये क्या मांगते रहते हैं हम लोग हमेशा ! काश ये मिल जाए .... वो मिल जाए... पद... प्रशंशा... पदारथ...पैसा... जमीन जायदाद । कहोगे मैं तो नहीं माँगता । मन में विचार कैसे हैं ? ये करलूँ, फिर वो खरीद लूँगा, फिर वो मिलेगा... अगर ऐसा गणित मन में है तो ये माँगने का भाव है , संतुष्टी का नहीं । पूरी जिंदगी यूँही निकालने की ठान रक्खी है क्या ? काम की बात कब समझेंगे हम लोग? आखिर क्या मिल जाएगा ये सब मिलने पर ? जब रात को नींद आती है तो कहाँ चले जाता है ये बैंक बैलंस?

भीतर हम सब ये अच्छी तरह जानते हैं कि इस सब से कुछ नहीं होने वाला । हम जैसे आए थे, हमेशा वैसे के वैसे ही हैं । सोने के गहने कोई सज पाया है कभी ? आंखे बंद करके देखो, एक रत्ती भी नहीं बदला है ये चिदाकाश .... ना ये बदलेगा । अब इस पन्ने पर आ ही गये हो तो यहाँ सीधी बात होगी । जो मैंने पाया है वो लिखना मेरा फर्ज़ है । कम से कम इस पन्ने पर तो ।

भिखारी चाहे अपने बिस्तर के नीचे करोड़ क्यों न छुपा ले, वो भिखारी ही रहेगा । जो माँगता फिरे वो भिखारी । जो संतुष्टी से न जी सके अपने वर्तमान हालात में, वो माँगता फिर रहा है । जिसके पास देना का भाव है वो धनवान है, भले ही कंगाल क्यों न हो । राजा बनना चाहते हो तो दस रुपै के ही फल लेके किसी अनजाने गरीब को खुले दिल से दे दो । किसी अनजाने के भले की इच्छा ही भाव की सम्पत्ती है । जैसे हमारे हिरदै में भाव है, वो ही हमारी असलियत है । ये ही हमारी असली सम्पत्ती है । कुछ माँगना है तो अनंत से अनंत प्रेम माँगो ।

ये हिरदै ना मानेगा सोने चाँदी के जेवर से । इसे तो केवल करुणा का जेवर भाए ....

2 comments:

Sunil Deepak said...

बहुत अच्छी बात कही है, हनुमान जी आपने. सोचने के लिए मजबूर कर देती है. सुनील

अनूप शुक्ला said...

बहुत खूब .संतोषम् परमम् धनम् की बात बढि़या कही.