28 November 2008

"कर मन मेरे सत व्यौहार"

सच के पीछे एक ताकत होती है। भारतीय समाज उस सच की ताकत को खो चुका है। सच की ताकत को खोने का तरीका है उसके विपरीत चलना, अपने हक के लिए घूस देना, कर्तव्य के लिए घूस लेना, असहाय को सताना, भोले, सच्चे को गुमराह करना वगैरह। सही रस्ता जानते बूझते गलत रस्ते पर चलने वाला भ्रष्ट है। उसका इलाज प्रायशचित है। गलत आदत को तोड़ना और सही आदत को बनाना प्रायशचित है। सच का मतलब वकीली सच नहीं। कोई शाब्दिक नाटक नहीं। सच का मतलाब सच्चे कर्म। सच्चा व्यवहार। जो करना था वो किया। जो नहीं करना था वो नहीं किया, परिस्थिती कैसी भी हो।

कैसे मालूम चले सच्चा क्या है या नहीं? वो अंतःकरण में महीन विचार है, जिसे करने से शांति मिलती है, चाहे कष्ट उठाना पड़े और ये ही तो परीक्षा है। वो दिल की आवाज़ है। जितना सुनेंगे उतना जोर पकड़ती जाएगी। वो गुरु का शबद है। वो अनहद नाद है। बुद्ध ने कहा है "अपने दीपक स्वयं बनो"। वो हिरदय का दीपक है। उसका आदर, उसका कहा मानना सच्चा व्यवहार है, भक्ति है।

वो मानव का सच्चा व्यवहार है। वो परमात्मा का संदेश है।

ठाकुर ने हिंजड़ों की फौज बुलाई है

ये अमर वाक्य गब्बर ने कहा था।

सैनिकों की वीरता पर टिप्पणी नहीं है। सैनिक वीर हैं। अगर ये नपुंसक नेता बचे हुए हैं, "निंदा" कर पा रहे हैं (और कुछ नहीं), चौड़े हो के घूम रहे हैं, तो सैनिकों के बल पर। अपने आप से हमारे नेताओं में दम बिलकुल नहीं है। दम मन की सादगी, मन की तीव्रता, मन में बेशक निर्णय करने की क्षमता से आता हैं। जो झूठा है, टुच्चा है, जो सही जानते हुए गलत काम करता है, चार वोट के लिए बिकता है, उसमें तेज कभी नहीं आएगा। सोना आग से तप के शुद्ध होता है।

बेपैंदे के लोटे, थाली के बैंगन, विदेशी औरतों के बनाए हुए नेता क्या देश को दमदार नेतृत्व दे पाएँगे?

कैमरे के पीछे वीर है। अंग्रेजी में गुटरगूँ करने में वीर हैं। माइक पकड़ के बड़ी बातें करने माहिर हैं। लंबी फेंकने में उस्ताद हैं। भारत के नेता, जिनहोंने नेतृ्त्व का रत्ती नहीं समझा, बुद्धिजीवि, जिनमें बुद्धि की सरासर कमी है, संचार माध्यमों के मदारी, ऐसे कागज़ी शेर हैं।

भारत में बेकार बतियाने की, बेकार फेंकने की आदत गहरी बैठ गयी है। ये जाली नोट की तरह है। जब तक चल रही है तब तक राजा बने बैठे हैं रामलीला में। लेकिन जैसे भारत में चार गाँव के मुखिया अपने को सम्राट बोलने लगे थे, शब्दों के जाल फैलाना और उसमें खुद फँसना आसान है।

गहरी गलतफहमियाँ हैं भारत को। चार अंग्रेजी के शब्द क्या सीखे भारतीय मानसिकता है कि चाँद पर पहुँच गये। इतना आसान नहीं है। हालांकि ये गलतफहमियाँ फिर अपना वेग और समाज बना लेती हैं। लेकिन उस समाज में कभी दम नहीं होता। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे मुर्दे समाजों से।

अगर कोई गोली चला रहा है तो उसकी निंदा करना बेकार है। निरर्थक है। गोली का जवाब गोली ही हो सकती है। ये सामान्य बात है। हर आदमी इसे समझता है। सही बात जानते बूझते फिलासफरों वाली बात करने की आदत पड़ गयी है हमारे नेताओं को, क्योंकि आलसी भतेरे काम करलेगा मेहनत ना करने के लिए। ये असलियत से भागने के तरीके हैं। असलियत से भागने वाले भगौड़े हैं, कायर हैं। और अगर कायरता को शब्दों के जाल से वीरता बना दिया जाए तो समाज के शरीर में जहर फैलते देर नहीं लगेगी।

शब्दों के पीछे विचार हैं। विचार के पीछे भाव हैं। भाव के पीछे संस्कार हैं। संस्कारों के पीछे इच्छा का इतिहास है। इच्छा हमारी असलियत है।

कोई कितनी अंग्रेजी बोल ले, कीमत अंतःकरण की है, हिरदय की है, मन की है। कर्मों की है।

अगर हमें तेज बढाना है तो शांत रहना सीखना पड़ेगा। जो सुबह शाम बतियाते रहते है मुरगी की तरह उनमें तेज नहीं बनेगा।

भारत खोखला हो चुका है। खुले आम चुनौती स्वीकार करने से मना करता रहा है। किसी एक की गलती नहीं है। समाज से व्यक्ति बनता है। और फिर व्यक्ति से समाज। भ्रष्ट समाज कमजोर नागरिक ही बनाएगा। कमजोर नागरिक खोखले नेता ही चुनेंगे। पंडों का बनाया हुआ भारतीय समाज कभी झेल नहीं पाया किसी भी विदेशी आक्रमण को। इसकी बुनायाद में छलकपट, कायरी, जातिवाद और आलास है। सामने है।

26 November 2008

आखिर कब तक चुप रहोगे

ये अजीब देश है हमारा। २० लाख से ज्यादा की सेना है। लाखों पुलिस वाले हैं। लेकिन फिर भी दिन दहाड़े आतंक हो जाता है।

मामला ये नहीं कि आतंक को कैसे रोका जाए। अगर कोई हमसे इतना चिढता है कि मारने के लिए खुद मरने को तय्यार है तो मुश्किल है।

मामला ये है कि इतना सब होने के बाद कोई जवाब क्यों नहीं दे पाता भारत। अगर इन लोगों के अड्डों पर धावा बोल दिया जाए, इनके परिवार, गाँव वगैरह को कीमत चुकानी पड़े तो अगली बार वो सोचेगा।

मामला ये है कि भारत का खून ठंडा पड़ गया है। अब मन वनडे और रियलटी शो में ज्यादा लगता है। अब रंगीन कपड़े पहने कूदते हुए नचकय्यों मे ज्यादा ध्यान है।

मामला ये है कि अब इन बूढों के बस का कुछ नहीं है। अब नया खून चाहिए। अब नया तेज चाहिए। अब इन बूढे नेताओं को इस्तीफा दे देना चाहिए।

भारत भ्रष्ट हो चुका है। भ्रष्टता में कोई दम नहीं। भ्रष्ट का कोई आदर नहीं। भ्रष्ट का कोई भविष्य नहीं।

जवानों, जागो।

15 November 2008

ये छुरियों का चक्का

कोई काम नहीं बनता?
चारों तरफ झगड़ा और कलेष टकरते हैँ?
जीवन में कहीं सुख नहीं मिलता?

अगर ऐसे सवालों में कोई दम लगता है। और अब माया का उलटा रूप दुनिया को देखना पड़ रहा है आर्थिक संकट से।

अब सही सीख की जरूरत है। इस पृथ्वी की, समाज की हालत अब नाज़ुक हो चुकी है। एक अद्भुत पुस्तक "छुरियों का चक्का" मिली, अगर आपके पास समय हो तो।

ये सब छुरियों का चक्का है। जब हमारे खिलाफ चल पड़ता है तो परिस्थिती उलटी बन जाती। परिस्थिती कर्मों से बनती है। अगर हम खुश रहना चाहते हैं, तो शुभ कर्म करने जरूरी हैं।

10 November 2008

साची प्रीत

अगर हम सुखी रहना चाहते हैं तो हमें अपना फोकस, अपना ध्यान "मेरा मेरा" नहीं करना चाहिये। कयोंकि ऐसा करने से शान्ति चली जाती है। लेकिन आज के युग में हम अपना मतलब नहीं देखेंगे तो भी हो सकता है हमारी आरथिक बैलगाड़ी लड़खड़ा जाएगी। पैसा सुख न भी ला पाए तो पैसे की कमी दुख ला ही सकती है। ये समाज ऐसा बन गया है़। चारों तरफ कलेष फैल गया है। उसके पीछे लालच। उसके पीछे असुरक्षा। उसके पीछे सुख दुख के कारिकारण को न समझ पाना। उसके पीछे बुद्धि का कुन्द होना। उसके पीछे मन को अशुभ मामलों में रस मिलना। उसके पीछे फूटी किस्मत। उसके पीछे विपरीत परिस्थिती। उसके पीछे अशूभ कर्म। उसके पीछे कुबुद्धि। उसके पीछे मन को अशुभ मामलों में रस मिलना। वगैरह।

जल ० डिग्री पर जमता है, १०० पर उबलता है। वो उसकी प्रकृति है। वो उससे बँधा है। उसे चाइस यानी चनने का अधिका नहीं है। मानव को है।

अगर मानव, मानव समाज दुखी है, कलेषित है, कलह में है, तो जाहिर है कि उसका बरताव ठीक नहीं है। सर्वत्व उसे कह रहा है कि वो गलत रास्ते पर है। तो सही रास्ता क्या है?

कौनसा ऐसा बरताव है, ऐसे कर्म हैं जो मानव की सच्ची प्रकृति हैं?

जिस बरताव से लंबे समय तक शांति और सुख मिले।

कौनसा ऐसा तरीका है जीने का जिससे प्यास बुझे। मन में जोत जगे। मन में तेज आए। मन दूसरे का सुख छीनने में नहीं लगे। शक तनाव है। शक दीवार है। शक सिकुड़ना है। शक छोटा दिल है। शक बेचैनी है। शक दुख है।

कहीं पढा कि अमरीका में सबसे दुखी पेशा वकील हैं। वकील का पेशा शक का है। वो किसी पे भरोसा नहीं करता।

सबसे बड़ा धन बुद्ध ने मैत्री कहा है। जहाँ मैत्री होगी वहाँ समाज सुखी होगा, लोग एक दूसरे पर भरोसा करेंगे। भरोसा चैन है। भरिसा शान्ति है। भरोसा खुशी है।

करूणा से मन शान्त होगा। करूणा से मन में ऊँचे विचार पकड़ने की ताकत आएगी। करूणा हिरदय को जगायेगी। करूणा हिरदय को निरमल बनाएगी। फिर वो आदमी बदल गया। फिर पुराना खुराफाती नहीं रहा। फिर वो समझ गया।

मैत्री और करूणा वो दो पंख हैं जो मानव को दुख सागर से उड़ा ले जाते हैं। मूरख को देवता बनाते हैं। कठोर दिल में फूल खिलाते हैं। योगी को सिद्ध बनाते हैं। मन में शुभ विचार का गढ बनाते हैं।

दोस्तों मैत्री और करूणा मानव की सच्ची प्रकृति, सच्चा व्यवहार हैं। क्योंकि जिसके पास ये दो हैं, वो सुखी है, प्रसन्न है, बुद्धिमान है, जगा है। वो सबका भला चाहता है।

साची प्रीत हम तुमसों जोरी
तुमसों जोर अवर संग तोरी।
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब

30 July 2008

एक सिमर प्यारे

"हरि एक सिमर
एक सिमर
एक सिमर प्यारे ।"

-श्री गुरु ग्रंथ साहिब

23 March 2008

दूध का दूध

ऐसा सुना है कि एक बार एक भिक्षु जिसे कुछ याद नहीं रहता था, उसने बुद्ध से पूछा कि संक्षेप में उसे धर्म की सीख दें, जो पूरी हो, और इतनी सरल हो कि उसे भूले नहीं।

तो बुद्ध ने कहा " मेरे धर्म का निचोड़, जो अतीत के बुद्धों ने भी कहा है, - भला करो, और बुरा मत करो।"

29 August 2006

धरमेंदर का तकिया कलाम

हम लोग मजाक बनाते थे कि धरमेंदर के आने पर शहर के सारे कुत्ते भाग जाया करते हैं। क्योंकि हर पिक्चर में वो बार बार "साले कुत्ते, तेरा खूऽऽन पी जाऊँगा" रटता रहता था।

अमरीका में दोस्ती करनी बहुत मुश्किल है। यहाँ आदमी पैसे, कर्जे, होड़, और प्रतिस्पर्द्धा के बुखार से बावरा है। और भी बुखार हैं, उनके बारे में बात ना ही की जाए तो बेहतर। सुना है भारत भी उसी दशा में जल्दी से जल्दी पहुँचने की कोशिश में है। आशा है भारत की यात्रा उस मंज़िल पर नहीं ले जाएग जहाँ अमरीका पहुँचा। क्योंकि जब एक आदमी दूसरे को केवल दुख, प्रतिस्पर्द्धा का, स्रोत देखता है तो फिर दोस्ती मुश्किल है। आदमी अकेला पड़ जाएगा, और भी दुखी हो जाएगा। शायद इसका नतीजा है की अमरीका में मानसिक रोग शायद दुनिया में सबसे ज्यादा होते हैं।

अब यहाँ दोस्ती करनी मुश्किल है, उसका नतीजा बच्चे को झेलना पड़ता है। उनकी भी दोस्ती नहीं हो पातीं, और उसका नतीजा यहाँ बच्चों की आपराधिक टोलियाँ बन जाती हैं। और सच तो यह है जिस तरह का यहाँ चाल चलन है अमरीकी बच्चों का, हम लोग अपने बच्चों को दूसरे देसी परिवारों के बच्चों से ही दोस्ती करने देते हैं।

तो हमारा नौ साल का छोटू बहुत कम हिंदी जानता है। देसी समुदाय के बच्चों के साथ खेलता है। एक दिन घर आया और मुझे पूछता है "डैड, वॉट इज़ द मीनिंग ऑफ 'साले कुत्ते'" ।

07 August 2006

पारलो इटालियानो

ये छोटू की ओर से। वो शायद किसी पिक्चर से लाया और मुझे ये सुनाया।

बोला इटलवी यानी इटली की भाषा में पीत्ज़ा को क्या कहते हैँ? मैं बोला "पीत्ज़ा"। बोला इटलवी में स्पागेटी को क्या कहते हैँ? मैं बोला "स्पागेटी"। वो बोला "देखा, इटलवी कितनी आसान है?"

05 August 2006

ये तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ

जब आप किसी नई जगह जाते हैं तो आपकी नज़र वो देखती है जो आँखों के सामने तो है मगर अब लोगों का ध्यान नहीं खींचतीं। ये ६ साल पुरानी बात है अब तो भारत काफी तरक्की पर है, अमरीका वालों को अंग्रेजी में पछाड़ रहा है। उस समय नया नया उत्तर प्रदेश सरकार ने हल्की शराब बेचने की छूट दी थी।

एक बार मैं मेरठ जा रहा था, गलत बस में चढ़ गया और मोदीनगर के पास किसी कस्बे में उसका आखरी पड़ाव था, वहाँ मुझे उतरना पड़ा। गरमी बहुत थी अगली बस का कुछ पता नहीं चल रहा था। प्यास लगी थी।

सड़क के साथ दुकान थी वहाँ लिखा था "यहाँ ठंडी बीर मिलती है।"

27 July 2006

बारूदी सुरंग ढ़ूँढ़ने वाले चूहे

कल ये खबर पढ़ी कि अफ्रीका में एक बड़ा सा चूहा होता है, जिसकी सूँघने की शक्ति कुत्ते जितनी तेज होती है। उन चूहों को बारूदी सुरंगों ढ़ूँढ़ना सिखा दिया गया है। चूहे कुत्ते से सस्ते पड़ते हैं, जो यूरोप से खरीदने पड़ते हैं, और अफ्रीका की गरमी ज्यादा नहीं जी पाते।

हर सुरंग ढ़ूँढ़ने पर चूहे को ईनाम मिलता है, एक मूँगफली का दाना।

इन सुरंगों की वजह से हजारों जीवन बरबाद हो रहे हैं। ये सरकारों के लीचड़पने का सबूत हैं।

इसका योग से क्या लेना? योग आशा का संदेश है। जो दुख अभी झेले नहीं हैं, उनसे बचा जा सकता है। अगर पूरी तरह से नहीं, तो उन्हें कम तो किया ही जा सकता है। इसमें सबसे बड़ी मदद हमारी बुद्धि है। इस साधन से जहाँ बड़ी समस्या थीं अब हल मिल सकता है। इसके लिए बुद्धि को तेज करना और भावुकता से दूर रहना जरूरी है। बुद्धि को सही रास्ते पर जगाना, आत्मचेतना से जीना योग है।

तब ये बुद्धि इस दुनिया में दुख कम करने में कुछ कामयाब हो सकती है। कुबुद्धि बारूदी सुरंग लगा रही है। बुद्धिमान जन को आशा और आत्मविश्वास की जरूरत है। तब जाके इस हजारों साल पुरानी कुबुद्धि की आदतों से लड़ा जा सकता है। इसके लिए सही नेतृत्व की जरूरत है। जो सही विचारों को बढ़ावा दे और गलत विचारों को बाहर करे। तब जवानों में आत्मविश्वास और तेज की लहरें दौड़ेंगी।

चबूत्रे पर चढ़ के अस्सी साल के नेता, अंग्रेजों के टट्टू संचार साधन ये तेज नहीं फैला सकते।

13 July 2006

वसो मेरे हिरदै

कर किरपा वसो मेरै हिरदै
होई सहाई आप ॥
सुणि सुणि नाम तुम्हारा
प्रीतम प्रभु का चाव ॥
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब

वस जाओ मेरे हिरदय, और क्या आशीरवाद माँगू ....मेरे ही नहीं औरों के हिरदय भी.... पा सकें गुरु किरपा से हम सरब पियार... मिल सकें हम उनसे जो दिखा सकें हमें सही ध्यान विचार...


सतुगुरु पूरा जे मिलै पाईयै रतन विचार ॥
मन दीजै गुरु आपणा पाईयै सरब पियार ॥
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब

09 July 2006

गलत सीख

एक दिन कथा सुनने गया और ये सुना। परशुराम के पिता जमदाग्नि को पत्नि रेनुका पर किसी बात पर क्रोध आ गया। उन्होंने पुत्रों को आदेश दिया माँ का सर काटने को। एक एक करके सब ने मना कर दिया। फिर परशुराम घर आए युद्ध से। पिता ने उन्हें आदेश दिया कि सब भाइयों और माँ का सर काटने को। परशुराम ने आज्ञा का पालन किया, सबको खतम कर दिया।

फिर पिता इतने प्रसन्न हो गये कि वर दे दिया परशुराम को। परशुराम ने माँगा कि सब भाई और माँ जीवित हो जाएँ, और जो हुआ सब भूल जाएँ। पिता को पास इतनी क्षमता थी कि प्राण फिर निर्वाहित कर सकें, और सब फिर जी उठे, और सब कुछ सामान्य हो गया।

बेहतर ये होता कि कहानीकार ने परशुराम से मना करवा दिया होता़, और किसी जरिये से पिता का क्रोध का दौरा खतम करवा दिया होता।

आदर ‌और भक्ति में फरक है। पिता की भक्ति करना मूरखता है। पिता आखिर आदमी ही है। आदमी को परमात्मा के पद पर बिठा देना बेकार की भावुकता है। हर आदमी उसी हालत में है जिसमें हम हैं। हमें उसी से सलाह या आदेश लेने चाहिए जो हमें ज्ञानी, समझदार, सयाना लगे। अगर कोई क्रोध के दौरे में पगला गया है, मूरखता की बात कर रहा है, तो वो उस समय मूरख है। उसके पास ताकत है और हमारी मजबूरी है तो बात और है, लेकिन अगर हम मूरख की मानेंगे भावुक बनके तो हम बड़े मूरख हैं। उसका दौरा तो उतर जाएगा, वो तो अपने आप को मना लेगा कि दौरा पड़ गया था, लेकिन हम कैसे अपने आप को मना पाएँगे? जब निर्णय खुद लिया तो फिर दूसरे को कोसने से क्या फायदा।

हमारा धरम ऐसी भावुकताओं से भरा पड़ा है। धरम से समाज का ढाँचा बनता है। नतीजा ये हुआ कि हम लोग जहाँ भावुकता नहीं होनी चाहिए, वहाँ भावुकता का इस्तेमाल करते हैं। जब हम अपने नेता चुनते हैं, तो भावुकता के बूते पर, वो कौनसे परिवार से है, इसपर। कभी उन्होंने खुद को हमारा चाचा, बापु, वगैरह कह दिया था, इसलिए उनके वंशजों को हम अपना प्रतिनिधि बना लेते हैं। बताइये क्या आप डाक्टर या वकील भावुकता पर चुनेंगे? वो लोग हमारे जज़्बातों से खेल रहे थे, कुछ लक्ष साधने के लिए। अच्छा नेतृत्व, अच्छे अधयापक, अच्छे गुरु कभी जज़्बातों से नहीं खेलते। वो हमारी बुद्धि को जगाने की कोशिश करते है। फिर सही क्या है, गलत क्या है, ये हम खुद निर्णय कर सकते हैं।

जहाँ कोमल भावुकता होनी चाहिए, पति पत्नि के बीच, आदर होना चाहिए परिवार में, वहाँ सास बहू के खेल चलते हैं। दहेज का व्यापार चलता है।

ये सब उलटा पुलटा हो गया है। अब हमें सही सीख की जरूरत है।

03 July 2006

कुन्जी ३

यहाँ आपको ध्यान का निचोड़ देने की कोशिश की जा रही है। ये काम मेरे बस से शायद बाहर है, और गुरु की आज्ञा के बिना सिखाना, यानी गुरु बनना ठीक नहीं है। क्योंकि यहाँ गुरु चेले का सवाल ही नहीं, आप मुझे जानते ही नहीं, इसलिए लिखा। कोई जबरदस्ती नहीं है, जिसकी रुची हो इन मामलों में उन्हें ही आगे चलना चाहिए। नहीं तो तरक्की होगी ही नहीं समय बरबाद होगा। लेकिन इस पिंजड़े में से निकलने के साधन दे गयें हैं हमें ज्ञानी जन, इतना जानना बहुत है। जब जिज्ञासा जगे, तो कहीं कोई विधी है, ये जानना उपयोगी है। तब विधी ढूँढ करके इस्तेमाल की जा सकती है।

जब आप कहीं अकेले बैठे हों शान्त वातावरण में, तो जो "है सो है", उसका साक्षी बनकर अनुभव करने की कोशिश करें। शब्दार्थ न करने की कोशिश करें। जो विचार उठते हैं उन्हें सतर्कता से देखते रहें। कैसे एक विचार से दूसरा निकलता है, ये जानना जरूरी है। कैसे शुभ अशुभ विचार उठते हैं। इस क्षेत्र को जिसमें विचार भाव वगैरह उठते हैं, योग में अंतःकरण कहा गया है। इस विधी को योग में साक्षी ध्यान, और बौद्ध धर्म में विपस्सना कहा गया है।

मन को एक यन्त्र की तरह समझ पाना उपलब्धी है। ये इतना आसान नहीं है। शायद ही किसी को इतनी सिद्धी मिल पाती है। यन्त्र ढर्रे पर चलता है, हमें परेशान नहीं कर सकता। जब छोटी मोटी बात पर परेशान हुए तो पहचानना जरूरी है कि हम नियंत्रण खो गए थे यन्त्र पर, परेशान हम हुए, दुखी हम हुए, नुकसान हमारा हुआ। बड़ी मुसीबत पर तो बड़े बड़े परेशान हो जाते हैं, हम क्या चीज़ हैं।

24 June 2006

नेपाल में क्रान्ति

क्या कारण थे इसके?
अब आगे क्या?
सही नेतृत्व की क्या आवश्यक्तायें?

कारण थका हुआ, भ्रष्ट नेतृत्व था। जरूरी नहीं की इस राजा की गलती हो। जनता ने नेतृत्व पर लम्बे समय से विश्वास किया, आदर किया। नेतृत्व ने धोखा दिया। जो करना चाहिए था वो नहीं किया। जो नहीं करना चाहिए था वो किया। जनता के साथ विश्वासघात किया। आखिरकार जनता पक गई, और जो उस समय प्रतीक था, उसकी ताकत खतम कर दी।

इसका मतलब ये नहीं कि आने वाला नेतृत्व कोई अलग होगा। अगर हुआ तो किस्मत अचछी है। आसार कम हैं। नेतृत्व बदला नहीं है। वोही पुराने चेहरे जो पेहले भी कुछ नहीं कर पाए।

क्रान्ति लाना इतना मुश्किल नहीं है भावुक समाज में। ये चापलूसी रवैय्या है। पेड़ उगने में बीस साल लगते हैं, काटने में एक घण्टा। आग लगाना आसान है, बुझाना और निर्माण करना मुश्किल। घाव करना आसान है, भरना मुश्किल। सकारात्मत रवैय्या, जिस्से सबका भला हो, उसकी जरूरत है। उसके लिए प्रणाली, यानि सिस्टम बनाने पड़ते हैं। जो सही में काम करें बिना सेटिंग के। अगर फोन ठीक कराने है तो मिस्त्री को घूस देने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। वो ताकत का दुरुपयोग है, दुख पहुँचाएगा ही। उससे मारामारी फैलेगी ही समाज में। मारामारी के फैलने से उपद्रव में भला आदमी भी मरेगा। अगर बच्चे को पाठशाला भेजना हो तो नाक रगड़ने पर बात नहीं आनी चाहिए। मामला सहज होना चाहिए। रोज का जीवन साफ, हलका, सहज होना चाहिए। ये अच्छे नेतृत्व द्वारे बनाये हुए सिस्टम हैं। ये दुख कम करने के लिए किए हुए काम हैं।

जनता को भावुकता की शराब पिला के, नकारामत्मक शिक्षा के बाद अब जादू से स्वर्ण युग नहीं आ जाएगा। अगर हालत खराब है तो उसके पीछे लम्बा इतिहास है, कारण हैं, परिस्थितियाँ है। नेतृत्व के गलत निर्णय हैं। अच्छा नेतृत्व सबके भले की सोचता है। समुदायों में में सेतु बनाता है। जो पीढी अभी आई नहीं उसके लिए कुछ नींव छोड़ता है। शुभ भाव होनें चाहिएँ। ये जादू से नहीं आते। इनके पीछे कारण और परिस्थितियाँ होती हैं।

सबसे जरूरी है सबके लिए अनुकूल शिक्षा। अमीर का बच्चा कुछ सीखे और गरीब का बच्चा कुछ और, ये सही व्यवस्था नहीं है। बच्चे पर अतीत लोदना, माँबाप की गरीबी के कारण खटारा शिक्षा थोंपना अत्याचार है। कोई समाज कितना न्यायी है इसका अच्छा अन्दाजा आप ये देख के लगा सकते हैं कि वहाँ गरीब बच्चे के हुनर को पनपने का मौका दिया जाता है या नहीं। पद पहुँचने में काम आखिर हुनर आता है या सेटिंग?

ये सब ठीक से करने की लिए नेतृत्व की बुद्धि साफ होनी चाहिए। क्या सही गलत है ये बुद्धि है। ये करने से सुख होगा या दुख, ये बुद्धि है। बिना इसके सही, सम्यक नेतृत्व सम्भव है ही नहीं। केवल बुद्धि ही नहीं आत्मविश्वास की भी जरूरत है, लेकिन आत्मविश्वास चापलूस को भी हो सकता है। चोर, भावुकता से खिलवाड़ करने वाले, समुदायों में दरार डालने वाले, गुटबाजी करने वाले कभी अच्छा नेतृत्व नहीं दे सकते। चापलूसी और भावुकता दूश्मन हैं सम्यक बुद्धि के। जब अपने मन में ही गंदगी, चापलूसी भरी होगी तो क्या कोई समाज का रखरखाव कर पाएगा?

चिन्ता की बात ये है कि जो बीज नेपाल में तूफान लाए वोही भारत में भी हैं।

19 June 2006

भारत को चाहिए किर्किट से अवकाश

हद हो गई यार इतना पैसा ये खिलाड़ी कमाने लगे साबुन मंजन बेच के की साफ है खेलने में मन ना लगे इनका। जितना समय हम लोग इस वाहियाद खेल पर लगाते हैं, ये एक सामाजिक चस्का बन गया है। खिलाड़ियों का मन खेल में है नहीं। वो खेल के बाहर संचार माध्यमों में गिल्ली दंडा में ज्यादा रुची रखते हैं। बेतुकापन,भावुकपना और गैर जिम्मेवारी हमारे मीडिया का दूसरा नाम हो सकता है। जो बिके उसे और बेचो। अगर लोगों को किर्किट का चस्का लग गया है तो उस आग में ‌और घासलेट डालो।

आप में से ज्यादातर को याद नहीं होगा की टीवी से पहले भारत में और खेल भी खेले जाते थे। मैं छोटा था, यादें धुंधली हैं, मगर हम लोग रेडियो पर हॉकी, फुटबॉल उतने ही शौक से सुनते थे जितने किर्किट।

हुआ यूँ की किर्किट टीवी पर छा गया और बाकी सब को कुचल दिया मार्केटिंग और रोकड़े नें। किर्किट पाँच दिन चलता था, अच्छा टाइम पास था। फुटबॉल हाकी डेड़ दो घण्टा चलते थे, इसलिए किर्किट छा गया। फुटबॉल हाकी में कमसेकम मेहनती टीम, हट्टी कट्टी टीम के जीतने की ज्यादा संभावना तो होती है? सिवाय भारतीय उपमहाद्वीप के किर्किट टोटल फेल रहा है। बाकी दुनिया फुटबॉल विश्व कप मना रही हम धौनी की ज़ुल्फों में मस्त हें। धौनी जो खेले न खेले वो अलग। उसका मार्किट ऐसे हौ ऊपर चढ गया।

अब क्यों किर्किट ने कुचल डाले बाकी खेल भारत में, इस पर तो किताब लिखी जा सकती है। कुछ मिनट में सामाजिक मनोविज्ञान करने की कोशिश करता हूँ। जाहिर है इससे मेरे नए दोस्त नहीं बनेंगे, पुराने शायद चिढ जाएँ।

किर्किट निठल्लों का खेल है। आलसियों की बाछें खिल गईं। अरे यार किस वेले नें ये ५ दिन का खेल बनाया? कभी कभी तो छह दिन का भी हो जाता है। अब शरम से एक दिवसीय ज्यादा होने लगे हैं। फुटबॉल हाकी में व्यायाम इतना होता है कि २ घण्टे से ज्यादा खिलाड़ी खेल ही नहीं सकता। खिलाड़ी थका कि बाहर। एक मैच ठीक नहीं खेला कि बाहर। ये किर्किट अजीब है की खिलाड़ी मीडिया में प्रतिष्ठा पर गाड़ी खींच लेते हैं। और जातपात के कारण हमारे यहाँ शारीरिक स्पर्ष से लोगों के मन में घिन है। किर्किट इस वजह से भारत को जँचा। खिलाड़ी लम्बी पौशाक पहन के, निरर्थक रस्में करते रहते हैं। ये हमारे समाज को भाया।

हम लोगों को बेसिरपैर के टोटकों में मजा आता है। अस्सी साल के जवान जिन्का दिमाग कुन्द हो गया है, हमारे देश के करोड़ों का जीवन संभालते हैं, क्योंकि हम उनपर भावुक कारणों से विश्वास करते हैं। भावुकता बुद्धि नष्ट कर देती है तो हमारी राजनीति का कोई सिरपैर न था न है। आप हमारे धरम देखें तो वहाँ भी येही मिलेगा। तोते की तरह रटे जा रहे हैं। बात में कितना दम है, कोइ सिरपैर है कि नहीं इससे कोई मतलब नहीं। जो सीधी सटीक बात करते हैं वो हमारे समाज में ज्यादा नहीं चल पाते। जो उलटी सीधी, भावुक, अंधविश्वासी बात करते हैं उनकी चलती है। नेता लोग तांत्रिकों पर विश्वास करते हैं, हुनर पर, नेतृत्व पर नहीं। नए घर में बिजली हो न हो, सूखा नींबू जरूर मिलेगा दरवाजे पर। ये सब प्रमाण है कि हमें आत्मविश्वास की कमी है। अपने सीधीपन से किये हुए काम पर विश्वास नहीं है। और ये टोटके बचेखुछे आत्मविश्वास को भी नष्ट करदेते हैं। हुनर हम उसी कलाकार का मानते हैं जिसे अंग्रेज ने शाबाशी दी हो। नहीं तो कलाकार बेकार है।

अगर हमें सहज बुद्धि यानि कॉमन सेंस को बढावा देना है तो इन टोटकों को छोड़ना पड़ेगा। बिना उसके सम्यक आत्मविश्वास बनना मुशकिल है। इन टोटकों में हमारा भावुक पूँजीनिवेष किया जा चुका है। जैसे जुआरी या शराबी को लत छड़ाने के लिए कुछ दिन इनके जिक्र से भी दूर रखना पड़ता है, तब जाके वो अपना संतुलन पाके और कुछ कर पाता है। अगर जुआरी बुद्धि का इस्तेमाल कर पाता तो कबका छोड़ दिया होता। बुद्धि को ही तो नहीं जगने देता जुए का नशा़।

अब किर्किट से २ साल का अवकाश भारत को चाहिए।

18 June 2006

कुन्जी २

कुन्जी २
ये आपको कोई भी बता देगा की ये "मैं" ही दुख की जड़ है। मैंने यहाँ इस दुख के पिंजड़े से निकलने का भी रस्ता बताने की कोशिश की है।

मजे की बात ये है कि ये "मैं" आपको बचा भी सकता है। जब ये आग नियन्त्रण के बाहर है तो दुख है ये आपका घर जला देगी। जब ये वश में है तो सुख है आपकी रोटी पका देगी। किसके वश में? अपने आप के वश में।

और भी रस्ते हो सकते हैं, वो नक्शा मेरे पास नहीं है। यहाँ मुझे जो सबसे प्राकृतिक रस्ता लगा, जिसने मेरा दरद खतम किया, बता दिया। बाकी परमात्मा का जिस पर आशीरवाद है उसी की नाँव तरेगी।

गुरु नानक कह गए हैं कि "मन जीता जग जीत"।

मन ही मन को जीत रहा है। मन ही मन को समझ रहा है।

इस छोटे मैं के पीछे क्या है? बड़ा मैं, जिसे योग में द्रष्टा कहा गया है। असल में छोटा मैं गलतफहमी है, भय है। छोटे मैं में जीवन के प्रकाश की शक्ति नहीं है। जीवन प्रकाश द्रष्टा से हो रहा है। कम से कम ऐसा लगता तो है।

ये मैं ही बीमारी है। ये मैं ही दवा है। ये मैं ही औजार है। ये मैं ही अभ्यास है। ये मैं ही नक्शा है। ये मैं ही शुरुआत है और ये मैं ही लक्ष है। लेकिन जिस मैं से शुरु होते हैं वो काफी बदल जाता है। जैसे भद्दा कीड़ा सुन्दर तितली में बदल जाता है। पहले ये मैं गंदगी से भरा था। अब प्रेम से भरा है। घड़ा वोही है पानी बदल गया है। घड़ा टूट के अपना व्यक्तित्तव नहीं भूल गया है। अब भी वोही बीबी बच्चे हैं, वोही नौकरी, वोही माँ बाप। कुछ बदल गया है, कुछ खुल गया है, लेकिन वो समझाना मुशकिल है। कच्चा आम खट्टा और बेस्वाद था। अब पक गया है मीठा हो गया है। आम वोही है। ये सब प्राकृतिक है।

17 June 2006

भूल भुलय्या की कुन्जी

बच्चा जब जनम लेता है तो पशु से ज्यादा दूर नहीं होता। भूख लगी तो रो देगा। पेट में दरद हुआ तो रो देगा। नहीं तो चुपचाप शान्त पड़ा रहेगा। फिर एक दिन चमत्कार होता है। बच्चा माता पिता को पहचानने लगता है। चमत्कार ये है कि अब पहचानने वाले का निर्माण हो गया है। अब उसका "मैं" बन गया। ये "मैं" उसकी अपने मन में अपनी तस्वीर है। बच्चा पहले भी था। लेकिन उसमें अपने बारे में तस्वीर नहीं थी। बच्चे का मनोवैजज्ञानिक रूप से जनम हो गया। अब वो अलग है। अब उसकी मुसीबतें शुरू हो गयीं। अब उसका चैन खतम हो गया। अब सिर्फ भूख लगने पर ही नहीं परेशान करेगा। अब कल्पना करेगा और परेशान करेगा। समय और ध्यान माँगेगा। हँसेगा, खेलेगा, लड़ेगा। अब उसका व्यक्तित्व बनना शुरू हो गया। इसमें बहुत हद तक पहले से बना हुआ आता है। कुछ बच्चे प्रकृति से शान्त होते हैं, कुछ शैतान, वगैरह।

बिना इस "मैं" के बच्चा प्राकृतिक इच्छाओं को वश में नहीं कर सकता। बिना इसके उसमें पशु का स्वभाव है। इसके साथ भी पशु का स्वभाव हो सकता है अगर सही परिस्थिती नहीं मिलीं। वो माता पिता, शिक्षा, संस्कृति से सीख के इंसान बनेगा। मनुष्य और पशु में ये ही फरक है कि मनुष्य अपनी प्राकृतिक इच्छाओं को वश में कर सकता है। कुत्ता कुत्ता ही रहेगा। कभी कहीं किसी मौके पर कुत्ता भलाई का काम कर देगा। वोभी तब अगर कुत्ता आदमी के साथ पला है। अब उसमें आदमी के कुछ गुण आ गये।

प्रकृति का सबसे बड़ा चमत्कार ये "मैं" है । भौतिकी कहते हैं ब्रह्माण्ड को बने १४०० करोड़ वर्ष हो चुके हैं। इस "मैं" को बनने में १४०० करोड़ वर्ष लगे हैं। केवल इस "मैं" में ही जगने की क्षमता है। हम इस "मैं" का सही इस्तेमाल कर सकें। ये "मैं" दुनिया में चैन का स्रोत बन सके।

जब ये "मैं", "मैं" को ढूँढेगा, टटोलेगा, तो योगी हुआ। जब "मैं" "मैं" को पा लेगा, समझ जाएगा, तो चैन पाया। फिर उसके जीवन का असली काम शुरु हुआ।

मेरे घर आई एक नन्हीं परी

मुबारक हो, आप फिर से चाचा, या चाची बन गए। माँ बेटी सब ठीक हैं। जहाँ तीन थे अब चार हो गए। रातों की नींद गायब हो गई। मेज पर मेरी किताबों की जगह अब रुई, डाईपर, और न जाने क्या क्या बच्चे का तामझाम जम के बैठ गया। श्रीमती जी से बात करे दिन निकल जाते हैं। किसी के पास टाइम नहीं है। घर में वी आई पी आ गयी हैं। हमारी जरूरत डाइपर बदलने, बड़े साहबज़ादे को फुटबॉल खेलने, हिन्दी सीखने ले जाने और छुटकी को डकार निकलवाने के लिए ही पड़ती है। जिन्होंने शादी नहीं की है, उनको ट्रेलर दिखा रहा हूँ।

07 May 2006

बुरा जो देखन मैं चला ...

असली दुख वो नहीं जो बुराई लोगों ने हमारे साथ करी। असली दुख वो है जो मूरखता में पड़कर बुराईयाँ हमने करीं। क्योंकि हम ये जानते थे कि हमारे पास चुनाव था। वो न करने को। कोई कितना भी बड़ा मूरख, पापी, नीच क्यों न हो। उसके अन्दर वोही विवेक है जो संत के अन्दर है। उसके पास आज़ादी है मूरखता करने या न करने को। कोई मूरख नहीं यहाँ। सब सयाने हैँ। सब अपना भला चाहते ही हैँ। उस भले को पहुँचने के रस्ते में कुछ भूल हो गयी किसी से। वो ठीक भी हो सकती है। जीवन के अवसर हमारे हाथ में नहीं हैं। ये पिक्चर हमनें नहीं लिखी। ये भयानक न हो।

परमात्मा हमें सद्बुद्धि दे।
परमात्मा हमें सही से गलत जानने का विवेक दे।
परमात्मा हमें सही रस्ते पर चलने का आत्मविशवास दे।
परमात्मा हमें भली संगत से मिलाए।
परमात्मा हमें गुमराह लोगों से दूर रखे।
परमात्मा हमें जीवन में शुभ अवसर दे।
परमात्मा हमें जीवन में ज्यादा आराम न दे।
परमात्मा हमें जीवन में ज्यादा कठिनाई न दे।
परमात्मा हमें जीवन में कुण्ठाओं में न फँसने दे।
परमात्मा हमारे जीवन को वैकुण्ठ बनने दे।
परमात्मा हमें ये वैकुण्ठ सबको बाँटने के अवसर दे।

21 March 2006

पैंसठ साल के जवान

ये हमारे देश की खासियत है। पैंसठ साल के बूढे अपने आप को जवान मानते हैं। नहीं तो फिर क्यों पैंसठ साल के बूढे अपने आप को युवा नेता कहलाते?

भविष्य दिनबदिन गढ्ढे में गिरता जा रहा है। आखिर क्या किया है इन नेताओं ने भारत के लिए? शायद हम लोगों में नेतृत्व की कमी है। आपको इतिहास की किताबों में ये कोई नहीं बताएगा की हमारे राजा इतने लीचड़ और अन्यायी थे की अंग्रेजों के आने पर जनता ने राहत महसूस की। जनता ने स्वागत किया न्याय का। शायद आप ये न जानते होंगे की १८५७ में हार का असली कारण ये था की बगावतीयों ने लूटमार, और ताकत का दुरोपयोग शुरु कर दिया था। वे जनता का सहयोग खो चुके थे।

हमें ये बड़ा गर्व है प्राचीन भारत पर। जवानों को इन भावुकता के जालों में से बचना चाहिये। ये वोही प्राचीन भारत है जहाँ पर असहाय विधवाओं को जला दिया जाता था। जहाँ शूद्र के कान में सीसा डाला जाता था वेद सुनने पर। आपका भविष्य आपका है। केवल आपका अतीत आपका है। ये हजारों सालों की मूरखता आपकी नहीं है। मूरखों के हाथ में राजनैतिक बल न जाने दें। कोई किसी परिवार का है या किसी धरम का, अगर इस कसौटी पर हम लोग ताकत इनको सौंपेंगे तो जिम्मेदार हम हैं इस लीचड़ नेतृत्व के।

अगर आप भारत के पुराने शहरों में जाएँ तो पाएँगे हमारे असली मानसिकता। कोई एक पौधा तक लगाने के लिए तैयार नहीँ है क़ौम के लिए। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो खूब जंगल थे। वो जंगल आज़ादी के बाद काले धन में बदल गए। जितनी रेल अंग्रेजों ने भारत में छोड़ीं, उससे शायद ५ प्रतिशत भी ज्यादा नहीं बना पाए हैं हमारे नेता। पैसा जरूर खर्च किया है। करजा जरूर लिया है। सबकी हवेलियाँ बन गईं।

क्या बचा है जवानों के लिए? शराब से भरी थैलीयाँ और कुक्कड़। वनडे मैच। अश्लील पिक्चरें जहाँ अब लगता है गोरी चमड़ी का नाच का फैशन है। नंगी तस्वीरों से भरे अखबार।

जवानों, ये समाज पहले से ही भ्रष्ट था, और अब और ज्यादा भ्रष्ट हो रहा है। एक तुम पर ही उम्मीद की जा सकती है। पहाड़ पर चढना हो तो पहला कदम घर की सुरक्षा से बाहर जो लिया, वो सबसे महत्वपूरण है। हर आदमी बुद्ध नहीं बन सकता। हर आदमी अमिताभ नहीं बन सकता। लेकिन हम अपनी तरफ से कहीं कोई बदलाव ला सकते हैं। हर पेड़ की शुरुआत कहीं किसी बीज से हुई थी। धरम का मतलब आँख मूँद के बैठ जाना नहीं है। ये सबको मालूम है क्या सही है क्या गलत है। अब इसको बाहर भी चमकने का मौका मिले। तब ये भारत गर्व करने लायक होगा। मूरख अतीत का गर्व करते हैं। बुद्धिमान लोग वर्तमान को कर्म से चमकाते हैं।

अगर युवाओं को भविष्य उजाला करना हो तो राजनीति में उतरना पड़ेगा। अगर दस साल बाद आप आम खाना चाहते हैं तो गुठली किसी को तो बोनी ही पड़ेगी। अपने गाँव कसबों में, जहाँ हो सके राजनीति में उतर जाओ और ईमानदारी के वातावरण की माँग करो। अकेले हीरो बनने की कोई जरूरत नहीं है समूह में ताकत होती है। बूंड बूंद से घड़ा भर जाता है। नेताओं को लगना चाहिये की जनता की नजर उन पर है। जब बुद्धिमान लोग, जवान लोग, संवेदनशील लोग समाज में रुचि लेना शुरु करेंगे तो धीरे धीरे ये रामराज बन जाएगा, नहीं तो ये नरक बन जाएगा। और कोई रास्ता नहीं।

19 March 2006

वो अब भी हमारे साथ है

एक बार मैं रेल में दफ्तर से घर जा रहा था। उन दिनों काम की वजह से काफी परेशान था। अमरीका के खटारा "ह" वीसा में फँस के, अच्छे खासे कैरियर को चौपट करके, अनजान लोगों के चंगुल में फँस के, दफ्तर की नेतागिरी में रौंदे जाने पर अपनी किस्मत को कोस रहा था।

मन में विचार उठा " हे परमात्मा ये मैं कहाँ फँस गया, कुछ मदद करो, कुछ हौसला बढाओ, कोई इशारा भेजो"।

एक आदमी बगल में बैठा था, वो उठा और सामने से निकल गया।

उसने जैकेट पहनी थी। उसकी पीठ पे लिखा था "गॉड इज़ विद यू ईवन नाओ"।

20 February 2006

पायो गुरकिरपा

पायो गुरकिरपा
जीवन से परशान होके मैं ॠषिकेश में गुरुजी के पास पहुँच गया। मैंने कहा, सब शास्त्र कहते हैं कि हम सत्चिदानन्द हैँ। मैं सत् हूँ ये तो साफ है। नहीं तो परिवर्तन को पहचानूँगा कैसे। मैं चित हूँ ये भी साफ है। नहीं तो कौन पूछ रहा है?

लेकिन आनन्द कहाँ है? मुझे को सिर्फ परेशानी और दुख ही दिखाई पड़ रहे है।

उन महात्मा ने कहा, वो चींटी को देखो। उसे लकड़ी से छेड़ोगे तो क्या होगा? चींटी लकड़ी से दूर भागने की कोशिश करेगी। चींटी पहले से ही आनन्द में थी। उसे छेड़ा तो उसे पीड़ा का आभास हुआ, और वो फिर वापिस आनान्द की खोज में चल दी।
"ये सहज है। ये स्वतः है। ये है। ये बिना कारण है। ये मेरे से अलग नहीं है। ये मैं ही हूँ। "

बहुत समय लगा मूरख को समझने में।

आध्यात्मिक आनन्द कोई चरसी की तरह का अनुभव नहीं है। कि बस पड़े हैं कोने में। जब कोने से उठे तब? क्या ये सहज है? क्या आनन्द इतना स्वार्थी है?

"गुरकिरपा से अब मैं सिंह गर्जन कर रहा हूँ।
अब मैं आनन्दित हूँ।
अब मैं सहर्ष हूँ।
अब मैं सहज हँसमुख हूँ।
मेरा उत्साह गुरु की भेंट है।
अब मैं सहज सुख हूँ।
अब मैं दुख से चौकन्ना हूँ।
अब मेरी सहन भेड़िया जैसी है।
दुख भेड़ है मैं भेड़िया हूँ।
अब मेरी आँखों में तेज है।
अब मेरे ह्रदय में अट्टाहास है।
अब मेरी साँसों में प्रेम की माला है।
अब मैं आशीर्वाद हूँ।
अब मैं शुभ हूँ।
अब मेरा विश्वास असीमित है।
अब मैं बुद्धि की जीत करा सकूँ।
अब मेरी चाल में ध्यान है।
अब मैं धोखे को पहचान गया हूँ।
अब मेरा काम शुरु हुआ।
अब मेरी नींद खुली।
अब मैं प्रेम में खो गया हूँ।
अब मैं कहाँ हूँ? मेरा अन्त कहाँ है?
मैं कहाँ शुरु हुआ? अब मेरी सीमा कहाँ है?
अब मैं हूँ।
अब मैं प्रसन्न हूँ।
अब मैं खुशी का दीपक हूँ।
अब मैं प्राण विभोर हूँ।
अब मैं बालक जैसा उत्साह हूँ।
अब मैं चैन पा गया हूँ।
अब मैं दुखियों का सेवक हूँ।
गुरकिरपा से अब मैं आनन्द हूँ। "

ये आनन्द की भूमिका है।

किस्मत से मिलिये साधसंग

किस्मत से मिलिये साधसंग

एक सज्जन कहते हैं कि लहसुन प्याज खाना छोड़ दें। चाय कॉफी भी नहीं। ये मूरखता है। ऐसे चक्कर में जो पड़ेगा वो अपना समय बरबाद करेगा। क्या खाना है क्या नहीं ये रोजमर्रा की बातें हैं। अगर डाक्टर बोले ये मत खाओ तो बात में दम है।

पेट में दरद हो तो पेट के दरद की दवाइ ही लेनी चाहिए, चोट लगने की नहीं। हमारा बुखार दिमागी है। इसकी दवा भी मानसिक ही है। मैं ये हूँ, ये मेरा है, ये मेरे नौकर हैं, मैं इस जात का हूँ, मैं समाज के इस तबके में घूमता हूँ, मेरे पास इतने आर्थिक साधन हैं ... बीमारी ये "मैं" है... लहसुन न खाने से कोई फरक पड़ेगा? उलटा गर्व और हो जाएगा कि मैंने इतने साल से लहसुन नहीं खाया, मैं बड़ा महात्मा हो गया। महात्मा वो है जो महात्मा होते हुए भी आम आदमी की तरह रह सके। दूसरे को पता नहीं चले कितने पानी में है ये। अन्दरूनी स्थिती चाहकर भी कोई किसी को नहीं दे सकता। अगर किसी को यहाँ प्रेरणा मिले अपना जीवन बदलने में तो इस पन्ने का लक्ष पूरा हो गया। गुरु मुझ पर प्रसन्न हुआ।

असली आहार हमारे विचार हैं। अनियन्त्रित विचार इच्छा रूपी हैं। अपनी बीज छोड़ जाते हैं मन में। जहाँ से यात्रा शुरू होती वहाँ हमें अपने विचारों के प्रति सचेत नहीं हैं। जितने हम विचारों के प्रति सचेत हैं, उतना हम आगे बढ पाए।

जीवन बदलने के अवसर दुर्लभ हैं। मैं मूरख हूँ, मुझे कुछ ज्ञान नहीं है, ये ज्ञान के बीज हैं। लेकिन जब ये स्वतः जगे तब ही इसकी किमत है। केवल कह देने की बात नहीं है। दिल जब तड़प जगी, कि मेरा पूरा जीवन अनर्थ रहा, मुझे तो कुछ भी पता नहीं, तब शुरुआत हुई। ये बनावटी नहीं चलेगी। अज्ञान स्वीकार करके ही ज्ञान के लिए स्थान बनेगा। एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं। जब ये समझ लिया "मैं अज्ञान में डूबा हूँ", तो, म्यान खाली हो गयी। अब इसमें ज्ञान की तलवार आ सकती है। जरूरी नहीं कि आ ही जाए, इस सदमे को सहन करने के लिए तगड़ा दिमाग चाहिए। ये समय, जब अज्ञान स्वीकार हो चुका है, लेकिन ज्ञान का विश्वास नहीं जगा है, बहुत परेशानी से भरा है। एक नाव छोड़ चुके हो, दूसरी कहाँ है कुछ पता नहीं। जिसपर गुरु किरपा हुई उसके तरने की ज्यादा उम्मीद है। जिसमें ये सदमा सहना की ताकत नहीं है उसे इन सवालों से दूर ही रहना चाहिए। नहीं तो आत्मविश्वास टूटने से मानसिक बीमारियाँ आ सकती हैं। मुझे ऐसा लगता है की कई मानसिक रोगी ज्ञान की झलक पा चुके हैं, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं थे। अपने व्यक्तित्य से परे का आभास उनका नाजुक मस्तिष्क न झेल पाया।

मिले साधसंग किस्मत से
मत खो ये अवसर रे मुए
बन्दा चाहे तेरी भलाइ
तेरा ध्यान तेरी कमाइ
साधसंगत बन्दे को राह दिखाई
बुद्ध नानक कबीर से गुरु देओ मिलाई

हम निम्रता से जी सकें

जीवन हमारे वश में नहीं है। पहलवानों तक को लकवा मार जाता है। अगली साँस आएगी कि नहीं, कुछ गारण्टी नहीं। हम कहाँ पैदा हुए, किसके घर में, कैसे शरीर में, कुछ भी हमारे वश में नहीं है। कोई बच्चा अन्धा पैदा हुआ। वो बच्चा हम भी हो सकते थे।

हम किससे मिलेंगे हमारे वश में नहीं है। कल को हो सकता है कोई संत हमारे जीवन में आ जाए। या हो सकता है कोई मूरख हमसे टकरा जाए। कोई खुशखबरी आ जाए। कोई कलेश आ जाए।

कौन से लोग हमारे दोस्त बन जाएँ, क्या मालूम। ये वातावरण, संगी साथी, ही हमारे मन को आकार देते हैं। हमारा मन कैसा है, इस पर हमारा मामूली सा वश है। लेकिन इस मन को अच्छे या बुरे रास्ते पर कौन लाया था? क्या वो वाकया हमारे वश में था? नहीं, ऐसा नहीं था। ये सब हो गया। ऐसा विलयात की किताबों में फैशन चल पड़ा है, कि जो हुआ, इसलिए हुआ क्योंकि आपने ये चाहा था। कौन चाहेगा की उसका बच्चा अंधा पैदा हो? कौन चाहेगा कि सुनामी में लाखों तबाह हि जाएँ? जीवन महारहस्य है। एक के घर में राम पैदा होता है, एक के घर में रावण। कुछ भी हो जाता है। जो कहता है जीवन के कारणों और परिस्थितियों के क्रम को समझ गया है, समझ लेना कि फेंक रहा है।

हम अपनी परिस्थिती पर घमण्ड न करें। हम अपनी परिस्थिती पर ग्लानी न करें। हम दूसरे की परिस्थिती पर जलन न करें। हम दूसरे की दुख पर सहानुभूति कर सकें। परिस्थिती बदलेगी। जीवन अस्थिर है। परिस्थिती को वश करने के लिए बावले हुए फिर रहे हैं जिनके हाथ में तुक्के से कुछ ताकत आ गयी है। अब ये बावलापन उबल के सामने आ रहा है समाज में। पेड़ उगने में बीस साल लगते हैं, काटने में एक घण्टा। बावला हो जाना आसान है। फिर स्वस्थ होना उतना आसान नहीं है। हम निम्रता से जी सकें। यदि जीवन हमें ताकत दे तो उसके साथ निम्रता भी दे सके। इस बन्दर को उस्तरा न मिल सके। और मिले तो अकल भी साथ में मिल सके।

आशा और उत्साह से जलाया हुआ दीपक रौशनी फैलाएगा ही। आम की गुठली बोने से आम उगेगा ही। मैत्री और प्रेम से जिया हुआ जीवन सुख फैलाएगा ही। जो दूसरों के सुख के लिए जीएगा वो सुखी होगा ही।

24 December 2005

जो डर गया, समझो मर गया

यदि आप हमारे देश के धरमों को पढें तो पाएँगे की इनका लक्ष मोक्ष, या, निर्वाण है। मोक्ष का मतलब पुनर्जनम से मुक्ती बताया गया है। भारत के धरम दूसरे देशों के धरमों से ज्यादा सुलझे हुए हैं। आदमी की हालत जो हमारे धरमों ने समझाई है, उसमें ज्यादा दम लगता है। परमात्मा, या बुद्धधातु की, अद्वैत की जो सीख हमारे यहाँ मिलती है उसका कोई मुकाबला नहीं है। ऐसा कहा गया है की जिसके संस्कार जैसे थे, वैसी धार्मिक परिस्थिती में वो पैदा हुआ। इनको धार्मिक परिवार, या गोत्र कहा गया है। याने की किस रास्ते की तरफ उसका ज्यादा रुझान है।

हमारे धरमों ने ज्यादातर दुनिया को परमात्मा की लीला माना है। जब पूरी दुनिया ही खेल है तो खेल खेलने से कैसा कतराना? जब परमात्मा ही खेल रहा है तो हमें छोड़ने की कैसी सीख? बन्दे के खयाल में मोक्ष में जीवन से भागने को प्रोत्साहन दिया गया है। बुद्ध ने कहा है की जैसे अनन्त सागर में एक लकड़ी तैर रही है, लहरों के थपेड़ों में, और सौ वर्ष में एक कछुआ सागर के तल से उठकर ऊपर आए, और उसकी गरदन उस लकड़ी में एक छेद में से निकल कर हवा तक पहुँच जाए, इतना दुर्लभ है मानव जीवन। अब अगर इतनी अनमोल है ये, तो इस मानव जीवन का लक्ष इसी जीवन से छुटकारा बताने की क्या तुक हुई? "मैं वापिस ना आऊँ, क्योंकि जीवन दुख से भरा है", ये डरी हुई मानसिकता सी लगती है।

ये मोक्ष की आकाँक्षा भी अहंकार सा ही लगता है। पहले जमीन जायदाद चहिए थी, अब निर्वाण चहिए। असंतोष वही है। या केवल बनियागिरी बन के रह गये हैं हमारे धरम?

अरे किसने कहा था की जीवन फूलों की सेज पे गुजरेगा। हर आदमी दुख झेल ही रहा है। जरा से दुख से, कामिनी काँचन से डरे घूम रहे हैं वो लोग जो हमें रास्ता दिखाने वाले थे। पूरी जिन्दगी पत्थरों की पूजा में निकल गयी लेकिन किसी दुखी आदमी पर दया नहीं आई। बच्चों के पास पीने को पानी नहीं है और ये लोग दूध की नदियाँ बहा रहे हैं मूर्तियों पर। अगर दुख है तो उसके पीछे कारणों को हम देखें, और उनका हल करने की कोशिश करें। किसी का बच्चा मर गया है। किसी की बेटी को दहेज के लिए जला दिया गया है। दुख गहरे हैं। और दुख का कारण और परिस्थितियाँ अगर हमारे वश में नहीं हैं तो मामला और मुश्किल हो जाता है।

ये जीवन अनमोल है। ये अवसर दुबारा मिले या न मिले, कुछ पता नहीं। हम प्रसन्न रहने की आदत डालें। गमगीन रहना आत्मग्लानी की निशानी है, और आत्मग्लानी एकदम लीचड़ तरह का अहंकार है जिससे निकलना मुश्किल है। इसमें आदमी को दुख में मजा आने लगता है। हमारी पिक्चरें, खासकर पुरानी, इसका उदाहरण हैं। राजकपूर आँसू ही बहाता रहता है। ये कैसे मरद हैं जिन्हें आँसू बहाने में गर्व होता है?

हम जीवन का सामने शेर की तरह करें। साहसी, चौकन्ना, और ताकतवर। अपने इरादों को पूरा करने में काबिल। और अगर शेर पिंजड़े में बन्द कर भी दिया जाए तो वो शेर ही रहेगा, वोही साहस, वोही चौकन्नापन और वोही ताकत। आखरी दम तक हम तेज से भरे सकें। हम प्रेम के सिपाही बन सकें। और ये तेज, ये ताकत जब हमारे प्राणों में से उपजने लगे तो हम इसे दूसरों में भी बाँट सकें। रोशनी का फायदा तब है जब वो उजाला करे। हम ऐसी रोशनी बनें। हमारा तेज ऐसा हो की दूसरों को भी उत्साह से भर दे। बन्दे के खयाल में ये ही निर्वाण है।

साफ, निर्मल मन से कोई जीले,
दूसरों के सुख के लिए कोई जीले,
ऐसा निर्गुन प्रेम का प्याला कोई पीले ।
अब अनमोल हैं ये प्राण,
इनके आगे अब क्या निर्वाण ?
रोगियों की दवा बनूँ मैं,
दुखियों का सुख बनूँ मैं,
असहायों का सहारा बनूँ मैं ।
जीऊँ अनगिनत बार आऊँ यहाँ बार बार,
पोंछता रहूँ अनगिनत आँसुओं की धार,
काट पाए दुनिया के दुख ये मेरे उत्साह की तलवार ।
जला पाऊँ ऐसा दिया किसी दिल में,
फैला पाऊँ ऐसा आनन्द इस जग में
ऐसा आशीरवाद प्रभु दें हमें ।

21 November 2005

ये खेल इच्छाओं का

जापान से ये सुन्दर ज़ेन बौद्ध कहानी मिली। हम अपनी इच्छाओं के बारे में सतर्क रहें।

एक गरीब दुखी आदमी जंगल से गुजर रहा था, अपनी परेशानियों के बारे में सोचते हुए। एक पेड़ के सहारे बैठ गया। पेड़ जादुई था, जो उसे छुए उसकी इच्छा पूरी कर देता।

आदमी को ध्यान आया कि उसे प्यास लगी थी। सामने पानी का बर्तन आ गया। आदमी को झटका लगा, पर वो पानी पी गया, सोचके कि पानी पीने लायक है।

फिर उसे याद आया कि भूख लगी थी। भोजन सामने आ गया।

जब उसे समझ आया, तो उसने कहा "मुझे इच्छा है कि मेरा अपना सुन्दर घर हो"। सामने मैदान में घर खड़ा था। फिर उसने नौकर माँगे। फिर एक सुन्दर, चतुर पत्नी माँगी। सब मिल गए।

फिर उसे अपनी जीवन याद आया, और वो बोला, "रुको, ऐसा नहीं हो सकता। मेरी तकदीर तो एकदम बेकार है। ये सब मुझे भला कैसे हौ सकता है?" जैसे ही वो बोला, सब कुछ गायब हो गया। उसने अपना सिर पीट लिया और अपनी परेशानियों के बारे में सोचते हुए आगे चला।

31 October 2005

हम नहीं सुधरेंगे

एक सज्जन भारत से अमरीका आए । बड़े हैरान हुए । कैसे सड़क की दाँई तरफ लोग गाड़ी चलाते हैं । हवाई अड्डे से बाहर निकले ही थे । टैक्सी माँगी । टैक्सी चलाने वाले मिले बंता ।

सज्जन ने पूछा " आप तो भारत से होंगे ?"

बंता बोले " हाँ, बिलकुल । "

सज्जन बोले " भारत में तो हम सड़क की बाँई तरफ गाड़ी चलाते हैं । यहाँ सड़क की दाँई तरफ लोग गाड़ी चलाते हैं । आप को परेशानी नहीं हुई यहाँ पर ? "

बंता बोले " जी बिलकुल नहीं ।"

सज्जन बोले " अरे ये कैसे ? मुझे तो देख के ही परेशानी हो रही है । "

बंता बोले " जी हमतो वहाँ भी सड़क के बीच में चलाते थे, यहाँ भी सड़क के बीच में चलाते हैं । "

23 October 2005

बड़ी धमकियाँ

ये किस्सा मेरे सामने हुआ ।

मेरठ से ग़ाज़ियाबाद की बस में मैं शाम के समय आ रहा था । सरकारी बस थी, खटारा, शोर मचाती हुई । जब बस ग़ाज़ियाबाद के पास पहुँची तो कई लड़के चढ़े । एक एक करके कंडक्टर ने उन्हें टिकट दिया । एक कुछ हीरो टाइप था । उसने टिकट खरीदने से मना कर दिया । "मैं नहीं देता पैसे" , उसने साफ कह दिया, ग़ाज़ियाबादी पत्थर मार भाषा में । कंडक्टर ने बहुत समझाया, "बेटा, बस में पैसा तो देना ही पड़ता है, मुफ्त में नहीं चढ़ सकते" । लड़का बोला "मैं तो स्टाफ का हूँ" । कंडक्टर बोला, "तो अपना कार्ड दिखा ?" । लड़का फेंक रहा था । होते होते गरमा गरमी हो गयी ।

लड़का बोला " मैं तुझे गोली मार दूँगा, मेरे से पंगा मत ले ।"

कंडक्टर बोला, "अबे छोड़, दो रुपय का टिकट खरीदने में तो तेरे पेट में दरद हो रहा है, बीस रुपय की गोली क्या खरीदेगा ?"

झाड़ू की आदत

वो, जो पहले नासमझ था । ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह जटावन में रह रहे थे, महानीय सम्मुंजनी के बारे में ।

ये महानीय , प्रतीत होता है, झाड़ू लगाते रहते थे, सुबह से शाम तक । एक दिन वो झाड़ू लेकर महानीय रेवत के कमरे में गए, जो वहाँ हमेशा की तरह बैठे थे । इस पर महानीय सम्मुंजनी ने सोचा "ये आलसी जनता के चढ़ावे के खा के, आराम करता है । इसे कम से कम एक कमरे में झाड़ू तो लगानी चाहिए ।" तो महानीय रेवत ने उन्हें कहा " नहा के मेरे पास आओ" । महानीय सम्मुंजनी नहाने के बाद आए ।


महानीय रेवत ने उन्हें कहा "भाई, भिक्षु को हर समय झाड़ू नहीं लगानी चाहिए । सुबह झाड़ू लगाने के बाद उसे भिक्षा के लिए जाना चाहिए । उसके बाद उसे ध्यान कक्ष में बैठ कर शरीर के बत्तीस अंगों का ध्यान करना चाहिए । उसे ध्यान रहना चाहिए शरीर की नश्वारता का । शाम को उसे उठ कर फिर से झाड़ू लगानी चाहिए । मगर उसे पूरे दिन झाड़ू नहीं लगानी चाहिए । कुछ समय आराम भी करना चाहिए । " महानीय सम्मुंजनी ने बात को माना, और जल्दी ही ज्ञान प्राप्त लर अरिहंत हो गए ।

लेकिन उसके बाद, कमरों में कचड़ा भरा रहने लगा । तो भिक्षुओं ने कहा, " महानीय सम्मुंजनी, आप झाड़ू क्यों नहीं लगाते, कमरों में कचरा भरा रहता है ?" तो वो बोले "महानीयों, पहले मैं नासमझ था, अब मुझे समझ आ गयी है ।" तो भिक्षुओं ने बुद्ध को मामला बताया और बोले, " ये महानीय कहते कुछ हैं, और करते कुछ और हैं ।" तो बुद्ध बोले, " मेरा पुत्र महानीय सच कहता है, पहले उसे समझ नहीं थी, तब वो झाड़ू लगाता रहता था । अब वो ध्यान के आनन्द में मस्त रहता है । इसलिए अब वो झाड़ू नहीं लगाता ।" और उन्होनें ये दोहा कहा ,


१७२ वो, जो पहले नासमझ था, नासमझ नहीं है,
प्रकाश फैलाता है जगत में, जैसे बादलों से मुक्त चाँद ।

( ये कहानी धम्मपद १७२ के बारे में है )

मेहनत की रोटी खाओ

आदमी को महनत करनी चाहिए । ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह पीपल वन में रह रहे थे, अपने पिता के बारे में ।


एक समय पर, जब बुद्ध ने पहली यात्रा की कपिल नगर को, तो उनसे मिलने उनके रिशतेदार आए । कुछ समय बाद बुद्ध ने धर्म की शिक्षा दी । इसके बाद रिशतेदार चले गए, एक ने भी उनको आमंत्रण नहीं दिया । उनके पिता, जो वहाँ के राजा थे, को विचार आया, लेकिन वो भी बिना आमंत्रण दिये चले गए । घर पहुँचने पर उन्होंने बीस हजार भिक्षुओं के लिए भोजन बनवाया ।

अगले दिन जब बुद्ध नगर में आ रहे थे, भिक्षा माँगने के लिए, तो उनके मन में विचार आया, "क्या अतीत के बुद्ध, अपने पिता की नगरी में आने पर, अपने रिशतेदारों के घर सीधे जाते थे, या घर घर भिक्षा माँगने के लिए जाते थे । " समझने पर कि वो हमेशा घर से घर जाते थे, बुद्ध भी घर घर भिक्षा माँगने के लिए गए ।

जब राजा को समाचार मिला तो वो बुद्ध के पास गए और बोले, " पुत्र, क्यों मुझे सता रहे हो, इस नगर में तुम्हें घर घर से भीख माँगते देख कर मेरी क्या लाज रह जाएगी ?" तो बुद्ध बोले " मैं आपको लज्जित नहीं कर रहाँ हूँ । मैं अपनी परंपरा को मान रहा हूँ ।" राजा बोले, " पुत्र, क्या मेरी परंपरा ने तुम्हें घर घर भीख माँगना सिखाया है ?" तो बुद्ध बोले " महाराज, आपकी परंपरा में ये नहीं है । लेकिन मेरी परंपरा में ये है, क्योंकि सैकड़ों, अनगिनत बुद्धों ने घर घर भीख माँगकर ही गुजारा किया है " ये कहने पर उन्होनें ये दोहा कहा ,


१६८ मनुष्य को श्रम करना चाहिए, और नासामझी का जीवन नहीं जीना चाहिए ,
मनुष्य को सही जीवन जीना चाहिए, क्योंकि सही जीवन से,
मनुष्य सुखी रहता है, इस लोक में, और परलोक में।


१६९ मनुष्य को धर्म से जीना चाहिए, अधर्म से नहीं,
क्योंकि धर्म से जीने से, मनुष्य सुखी रहता है, इस लोक में, और परलोक में।


इस शिक्षा के बाद राजा और बाकी लोगों को परिवर्तन के फल का लाभ हुआ ।

( ये कहानी धम्मपद १६८, १६९ के बारे में है )

15 October 2005

क्या योगी स्वार्थी है ?

ये पुराना झगड़ा है । कुछों का मानना है कि योगी अपने मन की ही चिन्ता करता है । दूसरों के लिए उसके मन में करुणा नहीं होती । उनके मत में ये स्वार्थ है, जैसे अपने खाते में धन भरना ।

बात में दम है । असल में योगियों ने भी ऐसा कुछ खास किया नहीं जिससे इस मान्यता का खण्डन हो । असल में जो अधिकतर देखने में आता है, दिखावा ही है । कबीर जी कह गए है

हीरा तहाँ न खोलिए,
जहँ कुंजड़ों की हाट ।

जो दिखावा करते हैं, आसनों का, सिद्धियों का, विभूतियों का, वो खुद तो भटके हैं ही, दूसरे को भी भटका रहे हैं ।

जड़ पर ढ़ूँढ़ेंगे तो पाएँगे कि दूसरे से मान पाने की अभिलाषा ही है ये । इस मापदण्ड से ये लोग बहुत साधारण हैं । इनके मन में भी वोही मान सम्मान की भूख है ।

लेकिन शुरुआत कहीं से तो होगी । बच्चा पैदा होता है, तो एकदम बड़ा नहीं होता । समय लगता है । ठोकरें खाता है । जीवन उसे सिखाता है । दुख दूर करने से पहले, दुख है ये जानना जरूरी है । उसके बाद अनुशासन से योग सीखने से मन शान्त करना पड़ेगा । दूसरों का दुख दूर करने के लिए अपने मन में दुख के स्रोत को कुचलना पड़ेगा । भिखारी दूसरे को दान नहीं दे सकता । जब अपने पास कुछ होगा तोही दूसरे को दे सकते हो । जब अपना मन शान्त होगा तो उसमें प्रज्ञा को चमकने का मौका मिलेगा । जब प्रज्ञा जगेगी तो प्रेम भी जगेगा । ज्ञान के साथ प्रेम आयेगा ही । जो इन दोनों को अलग कहते हैं, वो व्यवहारिक बात नहीं है । जिन उदारणों को ले के ये बात उठती है कि योगी स्वार्थी है, वोही खोटे हैं । हो सकता है कि अब खोटे सिक्के ज्यादा हों, लेकिन अपने हिरदय में हर आदमी जानता है कि प्रेम ही जीवन का परम पद है ।

जीवन का सार क्या है ? मरते हुए किसी आदमी के पास जाओ और पूछो उससे । कुछ ना कुछ काम की बात बता ही देगा । ये करना चाहिए था । ये नहीं करना चाहिए था । जीवन में अवसर नहीं खोने चाहिए था । कोई ढ़ीट मरते हुए भी शराबो कबाब की बात करेगा, उसे अलग करो । जो काम की बात है, वो ज्ञान है ।

" जीवन का सार ज्ञान है ।

अपने आप के बारे का ज्ञान पाने का रास्ता योग है ।

इस ज्ञान का सार करुणा है ।

करुणा का सार प्रेम है । "

बचपन में सुना हुआ गाना ,

" तू प्यार का सागर है,
तेरी एक बूँद के प्यासे हम । "

10 October 2005

प्यार चाहिए या पैसा चाहिए ?

बचपन में सुना हूआ गाना,

यार दिलदार तुझे कैसा चाहिए
प्यार चाहिए या पैसा चाहिए ?

क्या चाहते हैं हम जीवन से ? समय कम है । जैसे जीवन अभी तक निकला है, वैसे ही बाकी भी निकल जाएगा । क्या जवाब देंगे हम लोग यमराज को ? क्या किया जीवन में ? क्या जीवन से किसी का भला हुआ, या केवल धरती पर बोझ ही बने रहे ? जब हम जाएँगे, तो क्या हालत छोड़ेंगे पर्यावरण की ? कैसा माहौल छोड़ेंगे आने वाली पुश्तों के लिए ?

जो अपने लिए ही सोचे वो बोझ है धरती पर । पैसा कमाने में कोई बुराई नहीं है । एक तरह से देखो तो पैसा शक्ति का ही रूप है । बिना शक्ति के कैसी भक्ति ?

अगर हम कुछ करना चाहते हैं तो सपनों को साकार करने के लिए शक्ति चाहिए । आज के जमाने में पैसा चाहिए । ये तथ्य है । यहाँ तक कि पैसा प्राण है ! पैसा मिलने पर कैसे चेहरे खिल जाते हैं , तो ये प्राण ही तो हुआ ?

हमारी फिल्मों को अगर आप मनोविज्ञानिक के चश्मे से देखें, तो पाएँगे कि चोर, तस्कर हमेशा अमीर होता है । अमिताभ केवल कह पाता है " मेरे पास माँ है " । चोर से टक्कर लेने के लिए उसे भी चोर बनना पड़ता है । बहनों की जरूरत केवल चोर के बलात्कार के लिए पड़ती है । ये चोरों की जमात है ।

ये हारी हुई, थकी हुई मानसिकता है । फिल्मों को लिखने वाले मन थके हुए हैं, गीतों की तो बात ही मत करो । आशा का नामो निशान नहीं । दिल में उत्साह नहीं, कोई उमंग नहीं । चलो कनेडा चलें और नाच लें, हो गई पिक्चर । ये काले धन फूँकने के तरीके हैं । चोर ही जब पिक्चर बनाएँगे तो और क्या बनेगा ? जब चोर देश चलाएँगे तो पूरा देश जेल बनेगा ।

हर दिन नया सूरज उगता है । हर दिन नए फूल खिलते हैं । हर दिन बच्चे खिलखिलाते हैं ।

आओ फिर से इनके जैसा उत्साह पैदा करें हिरदय में । ऐसी ऊर्जा लाएँ हिरदय में । जब हमारे हिरदय में उत्साह होगा तो आस पास भी फैलेगा । मत इंतजार करो अवतारों का, मसीहा का, शाम के टीवी का, वन डे मैच का, शराबो कबाब का । इसी क्षण हरदय में उत्साह ले आओ , जीवन में प्राण भर लो । अगर नहीं कर पा रहे हैं तो लम्बी साँसें लें, और रोक लें जब तक आराम से रोक सके । दो तीन मिनट में पुराना मन का आलस टूट जाएगा । कसरत करें । जब प्राण होगा शरीर में तो मन भी उत्साह से होगा । ये आत्मग्लानि से भरी फिल्में न देखें । आप अनमोल हैं ।

जब उत्साह होगा जवानों में, न केवल शराब‍ कबाब के लिए, बल्कि जीवन जीने के लिए, तो ये थके हुए चोर जो सब जगह हमारे समाज में घुस कर बैठ गए हैं, चुपचाप बोरिया बिस्तरा बाँध के निकल लेंगे । मन में उत्साह होगा तो दुनिया अपने आप रास्ते पर आने लगेगी ।

तो जवानों, पैसे कमाएँ । पैसा हमें न कमाए । पैसा कमाएँ प्रेम फैलाने लिए ।

पैसा चाहिए । प्रेम फैलाने के लिए ।

08 October 2005

जो ढ़ंकने लायक है

वो, जिन्हें लाज आती है जब लाज नहीं आनि चाहिए । ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह जटावन में रह रहे थे, जैन धर्म के नग्न साधुओं, निगंठों के बारे में ।

अब एक दिन भिक्षुओं ने जैन धर्म के नग्न साधुओं, निगंठों को देखा और ये बात करने लगे "भाई, ये निगंठ बेहतर हैं अचेलकों से, क्योंकि कम से कम सामने कुछ तो आवरण पहनते हैं । इन्हें कुछ तो लाज आती है " । निगंठों ने सुना और बोले, " हम इस कारण से आवरण नहीं पहनते, बल्कि, धूल के टुकड़े भी जीव हैं, उनमें जीवन है, इस भय से कि वो हमारे भिक्षा पात्र में गिर जाएँगे, इसलिए हम आवरण पहनते हैं " । काफी वाद विवाद हुआ, बाद में भिक्षु बुद्ध के पास गए और उन्हें बताया । बुद्ध बोले, " भिक्षुओं, वो, जिन्हें लाज आती है जब लाज नहीं आनी चाहिए, और वो जिन्हें लाज नहीं आती जब लाज आनी चाहिए, भविष्य में दुर्गति पाते हैँ " । फिर उन्होंनें ये दोहा कहा ,

३१६. जिन्हें लाज आती है जब लाज नहीं आनी चाहिए,
वो जिन्हें लाज नहीं आती जब लाज आनी चाहिए,
ऐसे लोग, खोटे मत के कारण दुर्गति पाएँगे ।

३१७. जिन्हें भय होता है जब भय नहीं होना चाहिए,
वो जिन्हें भय नहीं होता है जब भय होना चाहिए,
ऐसे लोग, खोटे मत के कारण दुर्गति पाएँगे ।


( ये कहानी धम्मपद ३१६, ३१७ के बारे में है )

ईर्ष्यालु महिला

कुकर्म को न करो तो बेहतर । ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह जटावन में रह रहे थे, एक ईर्ष्यालु महिला के बारे में ।

ऐसी कहानी है कि इस महिला के पति ने दासी के साथ परस्त्रीगमन किया । तो इस महिला ने दासी के हाथ पाँव बाँध दिये, नाक और कान काट दिये, और गुप्त तहखाने में बन्द कर दिया । फिर, पति से कुकर्म छुपाने के लिए बोली, " आओ, प्यारे पतिदेव, विहार चलें और धर्म उपदेश सुनें " । तो वो विहार गए धर्म उपदेश सनने ।


इतने में महिला के मिलने को कुछ रिश्तेदार उसके घर आए । जब अन्दर गए तो उन्होंने पाया जो कुकर्म हुआ था, और दासी को जाने दिया । दासी विहार गयी और सब के बीच जाकर गौतम बुद्ध को जो हुआ, बता दिया । बुद्ध ने सुना और बोले, " किसी को जरा सा भी कुकर्म नहीं करना चाहिए, ये सोचके कि दूसरों को पता नहीं चलेगा । चाहे दूसरों को पता नहीं चले, सुकर्म ही करने चाहिएँ । क्योंकि कुकर्म, चाहे छुपे रह जाएँ, बाद में पछतावा पैदा करेंगे लेकिन सुकर्म केवल प्रसन्नता ही फैलायेंगे " । फिर उन्होंने ये दोहा कहा ,


३१४. कुकर्म को न करो तो बेहतर, परिणाम पछतावा ही होगा ,
सुकर्म बेहतर है, उसे करने पर कष्ट झेलना न पड़ेगा ।


उपदेश के बाद पुरुष और महिला धर्म परिवर्तन के फल को प्राप्त हुए । उन्होंने दासी को मुक्त किया और वो भी धर्म की शिष्य बनी ।


( ये कहानी धम्मपद ३१४ के बारे में है )

07 October 2005

कटुक वचन मत बोल रे

कड़वाहट से मुक्त रहो । ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह वेलुवन में रह रहे थे, महानीय पिलिंदिवच्छ के बारे में ।

ऐसी कहानी है कि ये महानीय को आदत थी आम व्यक्तियों और भिक्षुओं से इस तरह बात करने की, "इधर आ नीच। चले जा, नीच " । जब हद हो गई तो कुछ भिक्षुओं ने बुद्ध को बताया । बुद्ध ने पूछा, "क्या यह सच है ?" पिलिंदिवच्छ बोले, " हाँ, सच है " ।

तो बुद्ध ने उसके पिछले जनमों को देखा और बोले "भिक्षुओं, क्रुद्ध न हों, वच्छ घृणा के कारण ऐसा नहीं कह रहा है । वच्छ ५०० जनम ले चुका है, और इन सब में ये ब्राहण परिवार में जनमा । इसलिए इसे ये आदत पड़ गई है । जिसने अपने आप को नीच भावों से मुक्त कर लिया है वो कभी कड़वे और क्रूर शब्द नहीं बोलता । केवल आदत के कारण ये मेरा पुत्र ऐसा बोलता है " । फिर उन्होंनें ये दोहा कहा ,

कड़वाहट से मुक्त, बोलो सत्य, सिखाए श्रोता को, ऐसे बोल बोलो ,
फिर न होगा कोई क्रुद्ध । जो ऐसे बोल बोले, उसे मैं कहता हूँ ब्राहण ।

02 October 2005

राजकुमार अभय की नर्तकी

आओ, देखो माया के खेल । ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह वेलुवन में रह रहे थे, राजकुमार अभय के बारे में ।

ऐसी कहानी है कि राजकुमार अभय ने सीमा इलाकों मे कूच करके शान्ति बहाल की । इससे उसके पिता बिंबिसार इतने प्रसन्न हुए कि जब वो लौटा तो उन्होनें उसे एक नर्तकी भेंट कर दी, जी नाच गाने में उत्तीर्ण थी, और उसे राज एक सप्ताह के लिए सौंप दिया । पूरे सप्ताह राजकुमार अपने महल से नहीं निकला, रंगरलियों में मस्त रहा । आठवें दिन नहाने के लिए नदी पर गया । फिर वो बगीचे में गया और फिर नाच में मस्त हो गया । लेकिन जैसे ही नर्तकी ने नाच शुरु किया, उसे जोर से दरद हुआ और वो वहीं मर गयी ।

राजकुमार अभय बहुत दुखी हो गया । एकदम उसे विचार आया " केवल एक बुद्ध को छोड़ कर, कोइ मेरे दुख को नहीं खतम कर सकता ।" तो वो बुद्ध के पास गया और बोला "महाराज, मेरा दुख समाप्त कीजिए ।" बुद्ध ने उसे साँतवना दी, बोले " राजकुमार, अनगिनत सृष्टियों से, अनगिनत बार ये नर्तकी ऐसे ही मरी है, और अनगिनत बार तू ऐसे ही रोया है ।" जब उनहोंनें देखा की राजकुमार का शोक कम हुआ उपदेश से, तो वो बोले "राजकुमार, आँसु न बहाओ, केवल मूढ़ जन अपने आप को दुख के सागर में डूबने देते हैं ।"

फिर उनहोंनें इस बारे में यह दोहा कहा

" आओ, देखो माया के खेल, राजा के रंगीले रथ की तरह,
इसमें मूढ़ जन डूबते हैं, मगर विवेकी जन इसका मोह नहीं करते ।"

01 October 2005

लंगोटिया त्याग

ऐसी कहानी सुनी है कि एक बार गाँधीजी किसी भक्त महिला से मिलने गये । उस समय वो नहा रही थी । बहुत देर तक इंतजार करने पर भी वो नहीं निकली । जब गाँधीजी ने दबाव डाला तो पता चला की महिला के पास केवल एक जोड़ी कपड़े ही थे । नहाने के बाद उसे उनके सूखने का इंतजार करना पड़ता था । उसकी दयनीय हालत देखकर गाँधीजी ने प्रण किया कि वो भी जीवन भर लंगोट में ही जीयेंगे ।

पता नहीं कहानी सच है कि नहीं , वो इतिहास का मामला है ।

आम जनता का पता नहीं, लेकिन योगियों के नजरिये से ये कहानी मूरखता से भरी है । "उसके सिर में दरद है तो मेरे भी हो जाए" , ये भाव है यहाँ । जहाँ एक परेशान था वहाँ अब दो हो गये । धरती का बोझ और बढ़ गया ।

अगर कोई दुखी है, कोई गरीब है, सताया हुआ है , तो अगर कुछ उसकी मदद के लिए कर सकें, और हिरदय में भाव हो तो, तो हमें कर देना चाहिये । उसकी तरह का दुख, या बीमारी, या गरीबी अपने सर ले लेना ये मूरखता है । आत्म ग्लानी का भाव गहरा अहंकार है, भावुकता है ।

योगियों, सुख फैलाओ, प्रेम फैलाओ । रोशनी और साहस की लौ बनो । आशा का स्रोत बनो । बच्चों की तरह मासूमियत से जियो । जरा जरा सी बात पर खिलखिलाते रहो । ये तेज है । ये योग है । योग का स्रोत करुणा है । कोई कष्ट में है तो उसका कष्ट दूर करने के लिए कुछ कर दो । और आगे चलो ।

"ये दुख है । ये दुख से छूटने का उपाय है ।" ये योग की भूमिका है । इसमें "मैं" का भाव कही नहीं है ।

पतंजली ने योगसूत्र २‍-१६ में कहा है
" जो दुख अभी आया नहीं है, उससे बचा जा सकता है "

ये सतर्क जीवन है । ध्यानी जीवन है । इसमें "मैं" का भाव नहीं है । ये मतलब नहीं कि "मैं" हूँ ही नही । नहीं तो कौन लिख रहा है और कौन पढ़ रहा है ? जीवन दुखी रहने के लिए नहीं मिला है ।

बदलना केवल नजरिया है । बाकी सब कुदरत में जो है, ठीक है ।

17 September 2005

आओ खुश रहने की आदत डालें

जिसे देखो हैरान परेशान । जिसके पास पैसा नहीं है वो परेशान कि जीऊंगा कैसे ? जिसके पास है वो परेशान कहीं चोरी न हो जाए, टैक्स कम कैसे दूँ ? छोटे छोटे बच्चे तक हैरान हैं । अगर पोकेमोन छूट गया टीवी पे तो ?

इस बारे में एक कहानी सुनाता हूँ । कई साल पहले अकेला था । समय बहुत था । परेशानी ज्यादा नहीं थीं । खाने को और सोने को था । आस पास वातावरण शान्त था । उस समय मुझे ये कीड़ा काट गया । जब हर ज्ञानी पुरुष ने कहा है कि आत्मा आनन्द है तो हर तरफ इतना दुख क्यों ? पेड़ पत्ते, कुत्ते बिल्ली, सब मस्त हैं, जितना मिल गया कैसे न तैसे खुशी से जी ही रहे हैं । एक आदमी ही है जो मारा मारा फिर रहा है । गरीब भी दुखी अमीर भी दुखी । जवान बूढ़े सब दुखी । आखिर इतना दुख क्यों ? जिस भी भगवान में कोई माने, रचना कोई क्यों करे अगर अंजाम इतना दुख होगा ? कुछ समझ नहीं आ रहा था । सुबह शाम बस ये ही घूमता रहे मन में । क्यों... इतना दुख क्यों ... । कोई जवाब नहीं नजर आ रहा था । अब सवाल ही ऐसा टेढ़ा पकड़ लिया था । साल गुजर गया । हरियाली से बरफ हो गई । फिर हरियाली ।

क्यों.... कुछ समझ नहीं आ रहा ...

एक दिन अचानक कुछ बदल गया । जैसे कोई बोझ उठ गया । जैसे कोई परदा उठ गया और अतीत पर परदा गिर गया । अचानक समझ गया कि जीवन में दुख है । दुख है क्योंकि दुख के कारण हैं । समस्या दुख की दिखती है । लेकिन दुख किसी चीज का फल है । दुख के बीज हैं । अगर कोई सुखी होना चाहता है उसे दुख के रास्ते से बचना चाहिए । कीड़े ने काटना करना बन्द कर दिया ।

समाज में अगर चारों तरफ दुखी हैं तो उसका अपना वेग बन गया है । उससे भय का निरमाण हो गया । अब इस समाज में जो बच्चे पैदा हो रहे हैं उनको भी परेशान रहना कौ आदत पड़ गई है । और इस भय से निकले हुए रीति रिवाज, कानून वगैरह भी दुख के जले पर नमक छिड़क रहे हैं । भय के कारण ये मानसिकता बन गई कि सुख एक "ज़ीरो सम गेम" है । जिसे देखो अपनी चारदिवारी भरने में लगा है । किसी भी तरह से जमीन, जायदाद, सोना चाँदी दबोच लें.... इसके पीछे मानसिकता ये है कि इन सब से खुशी मिलेगी, और ये खुशी के स्रोत सीमित मात्रा में हैं । इसलिए राम अगर खुश है तो शाम का उस खुशी के स्रोत पदारथ से वंचित रहना लाजमी है ।

ये बड़ी भूल है । जितने लोग खुश होंगे उतना वो औरों को खुश बना पाएँगे । मधुर गीत होंगे तब जब मधुर गीतकार होंगे । हँसमुख बच्चे होंगे तब हँसमुख माँ बाप होंगे । और फिर वो बच्चे एक दिन माँ बाप बनेंगे ...

इसलिए, आओ खुश रहने की आदत डालें और दूसरों को भी खुश करने की कोशिश करें । मन केवल आदत है विचारों की । उसे बदला जा सकता है । आदत बदलने के लिए पहले आदत है, ये जानना जरूरी है । आदत केवल इस क्षण में ही बदली जा सकती है । लेकिन मेहनत लगेगी पुरानी आदतों को तोड़ने में । बाहर की दुनिया पक्की है, वो धीरे धीरे ही बदलेगी । उसे बदलने की क्रांती केवल हम ही हो सकते हैं । जिन खोजा तिन पाइँया । साहस, धैर्य, वीरता, सादगी हों जिसके मन में उसको कोई नहीं रोक सकता इस लक्ष से ।

10 September 2005

जटाओं से नहीं

ऐसी कहानी है कि एक ब्राहण ने सोचा, " मैं माता और पिता की ओर से ऊंची जाति का हूँ, मैं ब्राहण परिवार में जन्मा हूँ । अब ये भिक्षु गौतम अपने चेलों को ब्राहण कहता है । तो उसे मुझे भी ब्राहण पुकारना चाहिए । " तो ये ब्राहण बुद्ध के पास गया और उनसे पूछा । बुद्ध ने कहा " ब्राहण, मैं किसी मानव को ब्राहण केवल उसकी जटाओं, जनम या परिवार के कारण नहीं कहता । केवल वो, जिसने सत्य को पा लिया है, उसको मैं ब्राहण कहता हूँ ।" और ऐसा कहने पर उन्होनें ये दोहा कहा ,

न जटाओं, न जनम न परिवार से हुआ कोई ब्राहण
जिसमें बसे सत्य और धरम, वो धन्य है, वो हुआ ब्राहण ।

( ये कहानी धम्मपद शलोक 393 के बारे में है )

09 September 2005

बीबी हुई बैरागिन

कुछ दिन पहले एक महाराज से ये सुनी । बैराग आसानी से नहीं होता । पहले जब लगता है कि बैराग हो गया तो अक्सर इसमें अभी काफी गलतफहमियाँ होती हैं।

एक सज्जन की बीबी नें कहीं प्रवचन सुन लिया । उसना कहा कि मुझे तो बैराग हो गया है । मैं अब खाना नहीं बनाउँगी । पति सकपकाया । शाम को मेहमान आ रहे हैं । बीबी नहीं मानी । बोली पकी दाल रोटी खरीद लाओ, सूखी दाल रोटी ही खाएँगे अब से । आदमी बेचारा क्या करता, खरीद लाया ।

आदमी बोला मेहमानों को सूखी दाल रोटी खिलाने से बेइज्जती होगी । तू बरतन गिरा देना, मैं पूछूँगा क्या गिरा, तू कह देना कि बैंगन की सब्जी गिर गई । दस मिनट बाद फिर बरतन गिरा देना, मैं पूछूँगा क्या गिरा, तू कह देना कि गोभी की सब्जी गिर गई । दस मिनट बाद फिर बरतन गिरा देना, मैं पूछूँगा क्या गिरा, तू कह देना कि भिंडी की सब्जी गिर गई । मैं कह दूँगा की अब तो केवल दाल रोटी ही बची है, मेहमान को । वो समझ जाएँगे ।

मेहमान आ गए । दस मिनट बाद बरतन गरने की आवाज आई ।

आदमी ने पूछा क्या गिर गया ?

बीबी बोली दाल गिर गई ।

08 September 2005

ना माँगू सोना चाँदी

बचपन में सुना हुआ गाना....

ना माँगू सोना चाँदी
ना माँगू बंगला गाड़ी
ये मेरे किस काम के ।

ये क्या मांगते रहते हैं हम लोग हमेशा ! काश ये मिल जाए .... वो मिल जाए... पद... प्रशंशा... पदारथ...पैसा... जमीन जायदाद । कहोगे मैं तो नहीं माँगता । मन में विचार कैसे हैं ? ये करलूँ, फिर वो खरीद लूँगा, फिर वो मिलेगा... अगर ऐसा गणित मन में है तो ये माँगने का भाव है , संतुष्टी का नहीं । पूरी जिंदगी यूँही निकालने की ठान रक्खी है क्या ? काम की बात कब समझेंगे हम लोग? आखिर क्या मिल जाएगा ये सब मिलने पर ? जब रात को नींद आती है तो कहाँ चले जाता है ये बैंक बैलंस?

भीतर हम सब ये अच्छी तरह जानते हैं कि इस सब से कुछ नहीं होने वाला । हम जैसे आए थे, हमेशा वैसे के वैसे ही हैं । सोने के गहने कोई सज पाया है कभी ? आंखे बंद करके देखो, एक रत्ती भी नहीं बदला है ये चिदाकाश .... ना ये बदलेगा । अब इस पन्ने पर आ ही गये हो तो यहाँ सीधी बात होगी । जो मैंने पाया है वो लिखना मेरा फर्ज़ है । कम से कम इस पन्ने पर तो ।

भिखारी चाहे अपने बिस्तर के नीचे करोड़ क्यों न छुपा ले, वो भिखारी ही रहेगा । जो माँगता फिरे वो भिखारी । जो संतुष्टी से न जी सके अपने वर्तमान हालात में, वो माँगता फिर रहा है । जिसके पास देना का भाव है वो धनवान है, भले ही कंगाल क्यों न हो । राजा बनना चाहते हो तो दस रुपै के ही फल लेके किसी अनजाने गरीब को खुले दिल से दे दो । किसी अनजाने के भले की इच्छा ही भाव की सम्पत्ती है । जैसे हमारे हिरदै में भाव है, वो ही हमारी असलियत है । ये ही हमारी असली सम्पत्ती है । कुछ माँगना है तो अनंत से अनंत प्रेम माँगो ।

ये हिरदै ना मानेगा सोने चाँदी के जेवर से । इसे तो केवल करुणा का जेवर भाए ....

26 June 2005

कौन बनेगा करोड़पति ?

अपना पेट तो कुत्ता भी भर लेता है। आखिर यह जीवन क्यों मिला है? क्या करूं जिससे जीवन में संतोष मिले, तृप्ती मिले। जाने कैसे यह जीवन मिल गया है, हमें तो याद नहीं कब माँगा था हमने।

शरीर तो आराम की जिंदगी माँगे। मन माँगे प्रशंसा, पैसा और पद। लेकिन ह्रदय ना माने। ह्रदय तो पहचाने केवल प्रेम को। हाँ हमने भी खेल लिए लैला मजनूँ के खेल। लेकिन वो भी जवानी के बुखार निकले। बंबई की फिल्में झूठी हैं। कोई "दी एण्ड" नहीं होता। किसी से भी पूछ लो। पैसा भी बना लिया। कोई चैन की नींद नहीं आई।

कई साल निकल गए इस बीच। फिर अनंत की कृपा से ह्रदय में प्रेम जगा। प्रेम किसके लिए पूछोगे। पता नहीं। बस प्रेम है। कोई प्रेमी नहीं है। बस सबको खुश देखने की इच्छा जग गई ह्रदय में। कीड़े ने काटना बंद कर दिया। फिर एक दिन एक महापुरुष ( दलाई लामा) की एक किताब हाथ पड़ी। जाने क्या क्या लिखा था उसमें, मृत्यु के बारे में, निद्रा के बारे में, सपनों के बारे में। हमारे तो सिर के ऊपर से निकल गई।

लेकिन एक पंक्ति उसमें लिखी थी जिसे पढ के कुछ बात समझ आई। उनका कहना था की यदि खुशी से जीवन जीना चाहते हो तो दूसरे के लिए जीओ। दूसरे को खुश करोगे तभी असली खुशी मिलेगी।

जब बिना कारण प्रेम हो गया तो क्या है करोड़पति? एक एक अनजाने की मुस्कान में क्या आनन्द मिल रहा है!आह.... आनन्द !

"कबीर मेरा मुझ में किछ नहीं, जो किछ है सो तेरा
तेरा तुझ को सौंपते क्या लागै मेरा। "

-श्री गुरु ग्रंथ साहिब

21 May 2005

साला मैं तो साहब बन गया

कुछ दिन पहले देश में घर वालों से बात हुई। पता चला आजकल वहाँ ये बुखार चल पड़ा है कि भारत चीन से अगर आगे नहीं निकला है किसी भी दिन सुबह की खबर में पता चलेगा की निकल ही गया।

समझ नहीं आता हँसुं या रोऊँ। सड़कों की हालत देखो। शिक्षा की हालत देखो।
न्याय की हालत देखो। पर्यावरण की हालत देखो। पानी खतम हो रहा है। हरियाली का नामोनिशान नहीं। सरकारी नौकर की तो छोड़ो, मंदिर तक में घूस से काम बनता है। रात को बारह से सुबह चार बजे तक लाईट आती है। ऐसे मैं बच्चे कैसे पढ पा रहे है पता नहीं। ज्यादातर जवानों और बूढों तक का को जाम, साकी, किरकिट और जुए के खयालों से फुर्सत नहीं।


देश की की कठिनाईयाँ मामूली नहीं। उनका हल आसान नहीं है। ये भी कोई गारण्टी नहीं कि हल होगा भी। मुमकिन है कि जनसँख्या के भार से पूरा सिस्टम ही खतम हो जाए। बीता कल केवल बीता नहीं, उस पीढी की गलतियों का फल भी आने वालों को भुगतना पड़ रहा है।

ऐसा में भाई लोग खयाली पुलाव पका रहे हैं। पका ही नहीं रहे हैं, खयाली पुलाव खा भी रहे हैं। जब खयाली पुलाव में इतना मजा आ रहा है तो असली के लिए मेहनत कोई क्यों करे?

पुरानी फिल्म का एक भिखारी का गाना याद आ गया, ये गाना उस जमाने के खयाली पुलावों की खिल्ली उड़ाता है।

"चीनो अरब हमारा, हिन्दोस्ताँ हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा। "

13 May 2005

घोड़ा दौड़ना चाहे तो ...

एक फिरते भिक्षु ने बुद्ध से कहा "बिना बोले और बिना मौन रहे मुझे सत्य बतलाओ ।"

बुद्ध ने केवल उसकी ओर देखा । भिक्षु ने प्रणाम किया और बोला "सत्य बतलाने के लिए बहुत धन्यवाद" । ऊसने फिर से प्रणाम किया और अपने रास्ते चले गया।

आनन्द ने बुद्ध से पूछा "आखिर आपने ने ऐसा क्या दिखा दिया उसे?"

बुद्ध बोले "घोड़ा जब दौड़ने को तत्पर हो तो चाबुक की छाया भी काम कर जाती है "

देसी टोटका

दिल्ली के पास एक ट्रक के पीछे लिखी शायरी,

"बुरी नज़र वाले तेरे बच्चे जीएँ,
बड़े होके देसी शराब पीएँ । "

घोड़ा ना करबै घास से दोस्ती

बनिये की दुकान पर लिखा था ,

"तुम साथ क्या लाए थे?
क्या साथ ले जाओगे?
सब कर्म प्रभु को अर्पण कर दो ।"

नकद के गुल्ले पर लिखा था,

"आज नकद कल उधार ।
उधार प्रेम की कैंची है ।
उधारी चढी दोस्ती कटी । "

08 May 2005

सुन रे ओ सभै

साच कहूँ सुन रे ओ सभै
जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो ।

तुम्हारे भले के लिए

सुना है यूनान (ग्रीस) में एक दार्शनिक रहता था। उसका कहना जीवन एकदम बेकार है, दुख से भरा हुआ है, आज तक किसी को खुश नहीं देखा, इससे बेहतर तो मर जाना है। वो सिखाता था। युवा लोगों को पकड़ के उनके सिर में भरता रहे कि "जीवन दुख से भरा हुआ है, जीने से क्या फायदा, मर जाना बेहतर है"।

उसके चलते कई युवा लोगों ने आत्महत्या कर ली।

दार्शनिक अस्सी साल का हो गया, और बड़ा तंदरुस्त था। सब ऐशो आराम से वो जीता।

तो आखिर एक सज्जन ने पूछ ही लिया :
"अगर जीवन दुख से भरा हुआ है, जीने से क्या फायदा, मर जाना बेहतर है, तो आप क्यों जी रहे हैं? दुसरे को क्यों आत्महत्या करने को कहते हैं? खुद क्यों नहीं कर लेते?"

दार्शनिक बोला " अरे बेटा जीवन दुख से भरा हुआ है, जीने से क्या फायदा, मर जाना बेहतर है, लेकिन मैं मर जाऊँगा तो इन्हें सिखाएगा कौन?"

मेरा धंधा

"मैं बंजारन राम की
मेरा नाम वखर व्यापार जी"

- श्री गुरु ग्रंथ साहिब

07 May 2005

वो ब्राह्मण है

ऐसा सुना है। एक बार भगवंत (बुद्ध) राजगृह के बंबू वन में, कलंदिकानिवाप में थे। उस समय महाकश्यप अस्वस्थ थे, पिफली गुफा में। जब वह स्वस्थ हुए तो उनको विचार हुआ "मुझे भिक्षा के लिए राजगृह जाना चाहिए"। उस समय लगभग ५०० देवता उनकी उपस्थिती में थे और उनके लिए जोरशोर से धनवान इलाकों में भिक्षा का इंतजाम कर रहे थे।
महाकश्यप ने देवताओं को एकतरफा किया और अपना भिक्षा का चोला पहना, भिक्षा का पात्र उठाया और राजगृह के उन इलाकों में भिक्षा माँगने गए जहाँ निर्धन थे, झोपड़ीयाँ थीं, जहाँ बुनकर रहते थे।

और बुद्ध ने देखा महाकश्यप को भिक्षा के माँगते जहाँ निर्धन थे, झोपड़ीयाँ थीं, जहाँ बुनकर रहते थे।

और इस बारे में बुद्ध ने उस समय घोषणा कीः

"जो चाहता है त्याग और अज्ञात को, जिसने स्वयं को वश में कर लिया है,

जो सत्य में अचल है, जिसने अधर्म को गिरा दिया है, पाप को अलग रख दिया,

उस व्यक्ति को मैं ब्राह्मण कहता हूँ। "

30 April 2005

मन का बोझ

पुरानी बात है। जापान में दो "ज़ेन" भिक्षु यात्रा पर थे। एक बूढ़ा भिक्षु था, दूसरा युवा उसका चेला।

शाम हो चली। उन्हें नदी पार करनी थी। अचानक बारिश और तूफान आने लगा। नदी के इस पार वह रुक गये।

नदी पार करने के लिए एक सुन्दर युवती रुकी हुई थी। जब तूफान तेज होने लगा, और अन्धेरा गहरा होने लगा, तो भिक्षुओं ने फैसला किया कि रात होने से पहले नदी को पार कर जाएंगे।

युवती ने भिक्षुओं से कहा "क्या आप मुझे अपने कन्धे पर उठा कर नदी पार करा सकते हैं? रात हो रही है, और मैं यहाँ अकेली छूट जाऊँगी"

युवा भिक्षु बोला "बिलकुल नहीं, हम स्त्री को नहीं छू सकते"

बूढ़ा भिक्षु कुछ नहीं बोला। उसने युवती को अपने कन्धे पर उठा लिया और नदी पार करा दी। युवती ने बहुत धन्यवाद दिया और अपने रास्ते चली गयी।

युवा भिक्षु चुप्पी मार गया। अगली सुबह जब यात्रा को चलने लगी तो उसने गुस्से से बूढ़े से पूछा "आखिर आपने संघ के नियम को क्यों तोड़ा? आपको शर्म आनी चाहिए एक युवा स्त्री को अपने कन्धे पर उठाने पर"

बूढ़ा बोला " मैंने तो उसे नदी पार करने पर वहीं उतार दिया था। लेकिन तुम तो उसे अभी भी उठाए हुए हो "

26 April 2005

देखन आयो

"मैं हूँ परम पुरख को दासा
देखन आयो जगत तमाशा "

-श्री गुरु ग्रंथ साहिब

पानी प्यासे को ढ़ूँढ़ लेगा

प्यास लगी होगी तो पानी तुम्हे ढ़ूढ़ ही लेगा। जब प्यास लगे, प्रेम की विरह जगे, तब जीवन शुरु हूआ। तब जगने के लक्षण पैदा हुए। तुम्हे प्यास लगे, इसी का इंतज़ार कर रही है ये कुदरत। जाने कब से।

सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं उनके जवाब से। जवाब तुम्हारे वश में नहीं। वो जो है सो है। जब सवाल शान्त हो जाएँ, तो समझना जवाब मिल गया। समय आने पर जवाब मिल ही जाएगा। पानी प्यासे को ढ़ूढ़ ही लेगा। दुख यह है कि हमें रास्ता दिखाने वाले कम बचे हैं। क्या रह गया है जीवन में? किरकिट जैसे वाहियाद खेल के लिए दीवाने। बंबई से निकली अति मूरख पिक्चरें। जाम और साक़ी की गज़लें। राजनीति और चुगली से भरे ये अखबार।

ये जीना भी कोई जीना है रे लल्लू ?

हीरा अपना मोल नहीं जानता। वो सोचता है मैं तो पत्थर हूँ, दूसरे ही मूझे ज्यादा भाव देते हैं। इसलिए वो दूसरे की प्रशंसा के लिए पागल रहता है। जब तक हीरा अपना मोल दूसरे से नापेगा, वो पत्थर ही रहेगा।

सच तो ये है कि कोई दुसरा हजार कोशिश करे तुम्हे प्यास लगाने की, प्यास तुम्हारा अति निजी मामला है। या तो ह्रदय में प्यास लगी है या नहीं। ह्रदय सच पहचानता है। उसके साथ टालमटोल नहीं चलती।

क्यों लगती है ये प्यास किसी को?

अजीब रहस्य है?

25 April 2005

भुने हुए केंचुए

चंदूलाल के बेटे झुम्मन ने अचानक भोजन करना बंद कर दिया । हर तरह के प्रयत्न किये गये लेकिन वो भोजन करे ही ना । अंततः उसे मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया । मनोवैज्ञानिक उसे जब लगातार पाँच घंटे तक समझाता रहा तो वह भोजन करने को राजी हो गया ।

मनोवैज्ञानिक ने प्रसन्न होकर पूछा "अच्छा बेटे अब बताओ क्या खाओगे?" उसने मनोवैज्ञानिक को क्रोध से देखा ... वह राजी ही इसलिए हुआ था कि पाँच घंटे से मनोवैज्ञानिक उसका सिर खा रहा था ... जाने कहाँ कहाँ की बातें समझा रहा था ।

गुस्से में उसने मनोवैज्ञानिक को कहा "केंचुए खाँऊगा ! "

मनोवैज्ञानिक थोड़ा झिझका ... ये क्या बात हुई ... लेकिन मनोवैज्ञान में नियम है कि मरीज को को आहिस्ता आहिस्ता फुसलाओ, धीरे धीरे राजी करो । चलो कुछ खाने को तो राजी हुआ । फिर अब केंचुए की जगह कुछ और खिलाने की व्यवस्था हो सकेगी । एकदम से मरीज से इंकार न करो उससे दोस्ती बनानी जरूरी है ।

केंचुओं की प्लेट का प्रबंध करवाया... अपने माली को कहा की बीन ला जितने केंचुए मिलें बगीचे में से ... केंचुओं से भरी प्लेट झुम्मन की ओर बढ़ाते हुए कहा "लो बेटे खाओ" सोचा उसने कि कौन खाएगा केंचुए ? खुद ही कहेगा की केंचुए मुझे नहीं खाने । सोचता होगा कौन केंचुए खिलाएगा ...

लेकिन झुम्मन बोला "इन्हें भून कर लाओ ।" "कच्चे नहीं खाउंगा । क्या पेट खराब करना है ?" मनोवैज्ञानिक गया और किसी तरह से उन्हे भूना । भुने हुए केंचुए लेके मनोवैज्ञानिक फिर आया और बोला "लो बेटे अबतो खाओ ।" झुम्मन बोला "मुझे केवल एक चाहिए । बाकी को फेंको । इतने नहीं खाने । मैं कोई भोजन भट्ट हूँ ? एक काफ़ी है ।"

मनोवैज्ञानिक ने सोचा अब झंझट मिटी अब एक पर तो आया धीरे धीरे रस्ते पर आ रहा है । वह केंचुए फेंक आया और एक को बचा लिया । बोला "बेटा अब खाओ" ...

झुम्मन बोला "पेहले आप आधा खाईये । मेरे घर में ऐसा नहीं की अकेले खा लें । पेहले आपको खाना पड़ेगा । शिष्टाचार मुझे मालूम है ।"

अब मनोवैज्ञानिक घबड़ाया की यह तो हद हो गयी यहाँ तो आधा केंचुआ खाना पड़ेगा । मगर मनोवैज्ञानिक भी आधे पागल तो होते ही हैं ... नहीं तो मनोवैज्ञानिक हौ क्यों होते ? मनोवैज्ञान की तरफ़ जो लोग उत्सुक होते हैं ... उनके दिमाग में कुछ ना कुछ गड़बड़ होती ही है तभी वह उत्सुक होते हैं । घबड़ाया उसका जी भी मिचलाया ... उनको भूना उसने... उनकी बास और ....क्या क्या करना पड़ रहा है ।

मगर इसका इलाज तो करना ही है । किसी तरह वह आधा केंचुआ खा गया । और बाकी का आधा हिस्सा झुम्मन की ओर बड़ाते हुए बोला "ले भय्या अब तो खा ले ।"

झुम्मन रोने लगा ... बोला ... "मेरे हिस्से का तो खुद खा गये अब इसे भी खा लो ... "

ये कहानी आचार्य रजनीश के एक कैसिट में सुनी ....

24 April 2005

चमत्कार

सुना है, और टीवी पर देखा भी है, थाईलैण्ड में एक बौद्ध आश्रम में शेर, हिरन और आदमी शान्ति से रहते हैं। भिक्षु के अनुसार आश्रम में प्रेम के वातावरण से शेर शान्त हो गये हैं और हिरन उनसे डर नहीं रहे हैं।
शेर और हिरन
शेर का कोई भरोसा नहीं किसी दिन मूड खराब हुआ और हिरन ही नहीं भिक्षु को भी साफ कर जाएगा।

असली चमत्कार आश्रम का प्रेम है।

वो भी तो सपना था

बनारस में एक साधु ने भीड़ इकठ्ठी कर रक्खी थी। वो प्रवचन करता था और कहता कि यह सब सपना है। कोई कहे कि पेट में दर्द है तो कहे कि कैसा पेट, कैसा दर्द, ये तो सब सपना है, माया है। कोई कहे बच्चे की तबीयत खराब रहती है, तो उसका वही राग, कैसा बच्चा, कैसी तबीयत, सब माया है।

एक दिन प्रवचन के दौरान पगलाया हुआ साण्ड बाजार में दौड़ पड़ा। जितने बाजार में थे, अपनी जान बचाने भागे। उनमें सबसे आगे वह साधु था। जब मामला शान्त हुआ तो उसने फिर प्रवचन शुरु कर दिया, कि यह सब तो सपना है।
एक सज्जन ने पूछा, कि अगर सब सपना है, तो आप साण्ड से डरे क्यों? तो वह बोला, मैं डरा नहीं, साण्ड तो सपना था।

तो सज्जन ने पूछा, कि साण्ड सपना था तो आप भागे क्यों ?

साधु बोला "मैं भागा कहाँ? वो भी तो सपना था। "

23 April 2005

जीवन के दो सवाल

धर्म में आखिरकार दो ही सवाल बचते हैं।

पहला है "मैं कौन हूँ?"
दूसरा "जीवन कैसे जीऊँ?"

पहले का कोई जवाब नहीं है ।
मैं, मैं हूँ। तुम, तुम हो। तुम "हो", बस यह ही सच है । तुम्हारा अस्तित्व, यह सत्, चित और आनन्द, ही तुम्हारा परिचय है । एक चींटी और महात्मा में कोई ऊँच नीच नहीं है, मनुष्यों में तो दूर । इसको समझने जाने कितने वर्ष लग सकते हैं । जिसको यह समझ आ गया वो हजार कोशिश करे समझा नहीं सकता किसी और को । महात्माओं ने बहुत कोशिश की इसकी । बड़े‍ बड़े ॠषिओं ने भी हाथ खड़े कर दिये और नेति नेति कह दिया । कोई कहता है की यह सब माया है, कोई कहता है की पुरुष प्रकृति हैं, कोई कहता है की जीव, माया और ईश्वर शाश्वत हैं, कोई कहता है यह शून्य है । योग सूत्र मे् कहा गया है की दृष्टा ही सत्य है ।
परेशानी यह है कि हर वाक्य का अर्थ कोई पात्र अपने हिसाब से ही निकाल सकता है । "मैं ब्रह्म हूँ", इसका अक्सर उलटा मतलब ही निकाला गया । "जगत मिथ्या है" शंकराचार्य का कथन, इससे बहुत घाटा हुआ भारत को, क्योंकि इससे आलसी और डरपोक समाज का निर्माण हो गया ।
मेरा मानना है की धर्म का बहुत बड़ा हाथ है हमारे मानसिक आचरण और समाज को बनाने में । इसलिए
धर्माचायों के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है कि सोच समझ कर मुँह खोलेँ। योग और वेदान्त में यह भारी फर्क है । योगी कम बोलता है, और पहेलियों में समझाता है, क्योंकि और कोई रास्ता है ही नहीं । बन्दर को उस्तरा दोगे तो वो परेशान करेगा ही सबको । प्रज्ञा या तो जगी या नहीं । प्रज्ञा और प्रेम एक ही हैं । इसलिए योगियों, कबीर ने कहा है कि कड़वे वचन न बोलो । यदि किसी को खुश कर सकते हो तो कर दो, वरना मुँह बंद रखो, यह ही प्रेम है ।

दूसरे के बारे में एक किस्सा सुनाता हूँ । करीब दस साल पहले में जीवन से तंग आकर मैं ॠषिकेश में एक स्वामीजी के पास गया । मेरी किस्मत अच्छी रही होगी की अच्छे सज्जन से टकरा गया । तो मैने पूछा कैसे निर्णय करूँ क्या किया जाए और क्या न, हर तरफ परेशानी दिखती है । उस समय मैने योगानंद की किताब "औटोबायोग्रफी औफ योगी" पढ़ी थी, और उन सज्जन की कहानी बहुत विचित्र थी , ऐसा लगता था कि इनको जीवन में कोई परेशानी नहीं बची थी । तो स्वामी जी का जवाब था "अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करके उचित कार्य कीजिए" । मुझे बात बिलकुल नहीं जची । मैंने सोचा था कोई मंत्र देंगे जससे जीवन का दुख हलका होगा । यहाँ तो जिस चीज से भाग रहा था उसे गले लगाने कि कह दिया !
फिर धीरे धीरे करीब एक साल पहले समझ में आ गया कि स्वामी जी सच कह रहे थे । जीवन भागने के लिए नहीं मिला है । आपकी समस्याएँ आपकी हैं , आपके समाज की हैं । जितना भागोगे उतना और दुखी करेंगी । यह अवसर हैं कर्म करने को । वीरता, विवेक और बुद्धि से ही जीवन सागर तैरा जा सकता है । अगर कोई जंतर मंतर की कहानी सुनाकर कहता है कि उसकी परेशानियाँ हल हो गयी हैं, जान लेना की इसके सच होने की संभावना बहुत कम है । यदि परेशानियाँ परेशान करती रही हैं, और भागने को मन करता है तो अभी समझ नहीं आई है।

22 April 2005

बुद्ध के बाद

बुद्ध के बाद
कहा गया है कि केवल महाकश्यप ही बोधी के रहस्य को समझ पाए तो गौतम बुद्ध संघ महाकश्यप को सौंप गए । इस कड़ी को बौद्ध ध्यानाचार्य परंपरा कहा गया है। इसमें बुद्ध का भिक्षा पात्र और चोला उत्तराधिकारी को सौंपा जाता था । जापान में इस बौद्ध धर्म की शाखा को "ज़ेन" और चीन में "चान" कहा गया जो की ध्यान शब्द से बने हैँ । हाईकु इत्यादी जापान की "ज़ेन" सअस्कृति से निकले । गौतम बुद्ध के बाद परंपरा इस प्रकार चली ।
१. महाकश्यप
२. आनन्द
३. शनवसिन
४. उपगुप्त
५. धीतिक
६. मीशक
७. वासुमित्र
८. बुद्धनन्दी
९. बुद्धमित्र
१०. पाश्व
११. पुंययश
१२. अनबोधी
१३. कपीमल
१४. नागार्जुन
१५. कणदेव
१६. राहुलभद्र
१७. संघनन्दी
१८. संघयथता
१९. कुमारलता
२०. शयात
२१. वासुबंधु
२२. मनोरथ
२३. हक्लेनयश
२४. सिंहबोधी
२५.बशाशित
२६. पुण्यमित्र
२७. प्रज्ञाधर
२८. बोधीधर्म
कहा जाता है कि तब तक, करीब ५०० वर्ष ईस्वी तक, भारत में धर्म की दुर्गती हो चली थी । बोधीधर्म को कोई लायक शिष्य न मिला जो बोधी का पात्र बन सके ।
नब्बे वर्ष की उमर में उसकी खोज में वह चीन चले गए । वहाँ परंपरा फिर से स्थापित की गयी ।
चीन में ध्यानाचार्य
१. बोधीधर्म
२. हुइ को
३. सेंग त्सान
४. ताओ ह्सिन
५. हुंग जेन
६. हुई नंग
कहा जाता है कि हुई नंग , जो कि चीन में छठे ध्यानाचार्य थे, ने बुद्ध के भिक्षा पात्र और चोला ध्यानाचार्य को देने की परंपरा समाप्त कर दी क्योकि गद्दी के लिए भिक्षुओं में झगड़ा होने लगा था ।

हमने भी

लो हमने भी ब्लोग बना ली ।